सोहराबुद्दीन मामला : भाई शाहनवाज़ुद्दीन के आवेदन पर कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, रुबाबुद्दीन शेख ने उसकी मंशा पर शक जताया

सोहराबुद्दीन शेख और तुलसीराम प्रजापति फर्जी  मुठभेड़ मामले में दोषी पुलिस वालों के खिलाफ चल रहे मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने सोहराबुद्दीन के भाई शाहनवाज़ुद्दीन के आवेदन पर फैसला सुरक्षित रखा।

शाहनवाज़ुद्दीन ने 10 मई 2018 को एक अर्जी दी थी कि उसे इस मामले में प्राथमिक गवाह बनाया जाए। अभियोजन पक्ष ने इस आवेदन की जांच के लिए और समय की मांग की और 6 जून को सीबीआई अभियोजक डीपी राजू ने कोर्ट को बताया कि  उन्हें इस मामले में पहले ही गवाह बनाया जा चुका है।

अजीब बात यह थी कि इस बात की जानकारी न तो अपीलकर्ता को दी गई और न ही उनके वकील नित्य रामकृष्णन को।

दूसरी ओर, रुबाबुद्दीन शेख जिसने इस मामले में कई आवेदन और याचिका दायर की है, ने भाई शाहनवाज़ुद्दीन की मंशा पर प्रश्न उठाया और कहा की वह हमेशा से ही भाजपा से जुड़ा रहा है।

क्या है आवेदन में ?

आवेदन में दावा किया गया है कि मृतक तुलसीराम प्रजापति आवेदनकर्ता से 2006  में उज्जैन कोर्ट में उस समय मिला जब उसे अदालत में पेश किया जा रहा था। यह भी कहा गया है कि उस समय प्रजापति काफी गुस्से में था और सोहराबुद्दीन की मुठभेड़ में हुई मौत में अपनी भूमिका के लिए आवेदनकर्ता से उसने माफी माँगी।

आवेदन में कहा गया है कि प्रजापति ने आवेदनकर्ता को बताया कि कैसे उसे गुजरात पुलिस के अधिकारी अभय चुडास्मा ने सोहराबुद्दीन को पकड़ने में उसकी मदद करने को कहा और उसे आश्वासन दिया कि उसे कुछ मामूली मामले में कुछ समय तक जेल में रखा जाएगा  पर भारी ‘राजनीतिक दबाव’ के कारण उसको तत्काल गिरफ्तार करना आवश्यक था।

आवेदन में दावा किया गया है कि प्रजापति को अपने मौत का अंदेशा था और उसने आशंका व्यक्त की थी कि अगली बार उसकी हत्या होनी है क्योंकि वह सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी कौसर बी को अगवा करने का प्रत्यक्ष गवाह था। आवेदनकर्ता ने कहा कि प्रजापति ने किसी तरह उसकी जान बचाने के लिए रुबाबुद्दीन को अपने हस्ताक्षर वाले दो सादे कागज़  दिए । हालांकि, यह भी कहा गया है कि प्रजापति ने शाहनवाज़ुद्दीन को अपने हस्ताक्षर वाले चार सादे कागज़ इसी कार्य के लिए दिए पर आवेदनकर्ता ने इसके बारे में नहीं बताया।

आवेदनकर्ता ने बाद में सीबीआई को वह सब कुछ बता दिया जो उसे प्रजापति ने बताया था और उसे चार सादे हस्ताक्षरित कागज़ भी सौंप दिए।  शाहनवाज़ुद्दीन ने कहा कि वह आवेदन देने के लिए बाध्य हुआ क्योंकि उसने जो सूचना दी थी उसके बारे में कोर्ट को नहीं बताया गया था।

इस मामले की सुनवाई की स्थिति

कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के जिन 96 गवाहों से पूछताछ की है उनमें से 60  अपने बयानों से मुकर चुके हैं। अभियोजन और बचाव पक्ष के वकीलों ने सीबीआई के विशेष जज एसजे शर्मा के समक्ष इस आवेदन का विरोध किया।

इस आवेदन के बारे में पूछने पर रुबाबुद्दीन ने कहा, “वो हमलोग से अलग रहते हैं, बीजेपी के आदमी हैं। आपको व्हाट्सएप करूंगा कुछ चीजें, आप देख लेना”।

जब इस मामले की सुनवाई के बारे में पूछा गया तो रुबाबुद्दीन ने कहा,

जनवरी 2007 में  मैंने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी और हरीश साल्वे ने मेरी पैरवी की थी और अभी किसकी पैरवी उन्होंने की है? (उन्होंने संकेत दिया की साल्वे ने  जज लोया की मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सरकार की पैरवी की थी )

इसलिए न्यायपालिका में जो भी हो रहा है मैं उससे खुश नहीं हूँ।  जज लोया के मामले में जजों की मानसिक क्षमता पर सवाल उठाए गए। यह स्थिति है, मैं क्या कह सकता हूँ।”

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