एनसीडीआरसी ने कहा, हज यात्री हज कमिटी के उपभोक्ता नहीं हैं, मुआवजे का दावा नहीं कर सकते [आर्डर पढ़े]

हज कमिटी ने कहा है कि वह हज पर सऊदी अरब जाने वाले यात्रियों के लिए इंतजामात करता है और ऐसा वह बिना किसी लाभ के करता है। इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता कि  हज यात्री उसके उपभोक्ता हैं और वे उससे किसी भी तरह के मुआवजे का दावा नहीं कर सकते। यह कहना है राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) का।

“…हज कमिटी बिना कोई मुनाफा कमाने की मंशा के अपनी सेवाएं दे रही है और सिर्फ वास्तविक खर्चे की राशि ही हज यात्रियों से वसूलती है।  हज यात्रियों से हज कमिटी किसी भी तरह का सेवा शुल्क नहीं लेती है। इसलिए शिकायतकर्ता को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 2(1) के तहत हज कमिटी का उपभोक्ता नहीं कहा जा सकता, यह कहना था एनसीडीआरसी के पीठासीन सदस्य वीके जैन का।”

राजस्थान के जोधपुर के रहनेवाले शिकायतकर्ता अब्बास अली और उनके बेटे फ़ैयाज़ हुसैन ने 2008 में हज पर जाने के लिए आवेदन दिया था।

आवेदकों के पास तीन श्रेणी के विकल्प थे जिसमें एक था ‘ग्रीन श्रेणी’ जो कि तीनों में सबसे अच्छा था। यात्रियों का चुनाव करने के लिए ड्रा  निकाला गया। इसमें शिकायतकर्ताओं का नाम नहीं आया। पर जब अतिरिक्त कोटा जारी किया गया तो उनके नामों को शामिल किया गया और उन्होंने यात्रा पर जाने के लिए प्रति व्यक्ति 96,940 रुपए  जमा करा दिया। उनकी शिकायत यह है की सऊदी अरब में उनको ग्रीन श्रेणी में शामिल नहीं किया गया बल्कि उन्हें ‘अज़ीज़िआ श्रेणी’ में रखा गया जिसमें ग्रीन श्रेणी वाली सुविधाएं उन्हें नहीं दी गईं।

शिकायतकर्ताओं  ने इसलिए उनसे वसूली गई 22,362 रुपए  की अतिरिक्त राशि की वापसी के लिए उपभोक्ता अदालत में शिकायत की।

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के अधीन आने वाली हज कमिटी ने इस शिकायत का विरोध किया और कहा कि  हज यात्री उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं आते।

कमिटी ने कहा कि  जिस समय शिकायतकर्ताओं के लिए इंतजामात किये जा रहे थे उस दौरान सऊदी रियाल की कीमत बढ़ गई जिसके कारण शिकायतकर्ताओं को उनसे ली गई राशि के तहत ग्रीन श्रेणी में जगह नहीं दी जा सकी।

कमिटी ने कहा कि रियाल की कीमत बढ़ जाने के कारण ग्रीन श्रेणी के तहत आनेवाले यात्रियों की वास्तविक राशि बढ़कर 1,06,742 रुपए हो गई।

जिला उपभोक्ता फोरम ने इस शिकायत को खारिज कर दिया पर राज्य आयोग ने अपील स्वीकार कर लिया और कमिटी को 22,362 रुपए शिकायतकर्ताओं को वापस करने का निर्देश दिया।  इसके अलावा उन्हें पांच हजार रुपए कानूनी खर्चे और 10 हजार रुपए हर्जाने के रूप में भी देने को कहा।

इसके बाद कमिटी ने पुनर्विचार याचिका दायर की।

एनसीडीआरसी का ध्यान इस ओर खींचा गया कि हज कमिटी की स्थापना हज कमिटी अधिनियम 2002  के तहत की गई जिसके क्लॉज़ 18 में स्पष्ट कहा गया है कि कमिटी की स्थापना भारतीय तीर्थयात्रियों की  हज की यात्रा का इंतजाम करने के लिए किया जा रहा है और यह सेवा बिना किसी फीस के दी जाएगी।

क्लॉज़ 18 में लिखा है : … मैं यह समझता हूँ की हज कमिटी निःशुल्क है। हज कमिटी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत नहीं आती है। इसलिए मैं हज कमिटी से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत किसी भी तरह के हर्जाने का दावा नहीं करूंगा”।

यह कहते हुए की शिकायतकर्ता  कोई उपभोक्ता नहीं हैं, आयोग ने कहा, “… हम मानते हैं की उपभोक्ता फोरम को इस तरह की शिकायत सुनने का अधिकार नहीं है। आलोच्य आदेश (राज्य आयोग का) को इसलिए निरस्त किया जाता है और इस तरह इस शिकायत को खारिज किया जाता है….”

 

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