भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 33 (b) की वैधता को चुनौती देनेवाली एक विधवा की याचिका को केरल हाईकोर्ट ने खारिज किया; अपनी संपत्ति का 50 फीसदी हिस्सा अपने संबंधी को देने के मृत पति के निर्णय को दी थी चुनौती [निर्णय पढ़ें]

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के प्रावधान समय की चुनौतियों को झेलने में सक्षम  रहे हैं और इसमें ज्यादा संशोधन की जरूरत नहीं हुई है, कोर्ट ने कहा।

केरल हाईकोर्ट ने एक विधवा की अपील को नकारते हुए भारतीय  उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 33(b) को चुनौती देने वाली उसकी याचिका को खारिज कर दिया। विधवा ने अपनी संपत्ति का 50 फीसदी अपने संबंधी  को देने के अपने मृत पति के निर्णय को चुनौती दी थी।

फिलोमिना नामक  इस महिला ने हाईकोर्ट में यह कहते हुए अर्जी दी थी कि बुढ़ापे में उसका देखभाल करने वाला कोई नहीं है और अपने पति की पूरी संपत्ति को अपने पास रखने का उसको अधिकार है। उसने कोर्ट से मांग की थी कि पुराने जमाने से चली आ रही व्यवस्था को बदलने की जरूरत है और इस क़ानून की जड़ में पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था  की संपत्ति और जनानात्मक अधिकार को खुद अपने पास रखने की इच्छा है। यह भी कहा गया कि हिन्दू उत्तराधिकार क़ानून के मुताबिक पत्नी अपने पति की संपत्ति की पूर्ण अधिकारी होती है।

जिस प्रावधान को इस महिला ने चुनौती दी है उसमें कहा गया है कि “अगर पति  का कोई वारिस नहीं है पर ऐसे लोग हैं जो उसके आत्मीय हैं, तो उस स्थिति में उसकी संपत्ति का 50  फीसदी हिस्सा उसकी विधवा को मिलेगा और शेष उसके आत्मीय को प्राप्त होगा जो की उसी क्रम में या नियम के अनुरूप होगा।”

न्यायमूर्ति शाजी पी चाली ने कहा कि यह क़ानून पिछले 92  सालों से समय की मार को झेलने में सफल रहा है और देश में संविधान के लागू होने के पहले देश के बहुत ही सक्षम प्राधिकरण ने इसको मूर्त रूप दिया था और इसको पहले समाप्त नहीं किया गया।

यह भी कहा गया कि इस अधिनियम की धारा 35 में  विधवा के अधिकारों के बारे में जो प्रावधान किए गए हैं उसके अनुसार इसमें किसी महिला की मृत्यु  के बाद उसके पति को भी संपत्ति के वैसे ही अधिकार मिले हैं जैसे एक विधवा को उसके पति की मृत्यु पर मिलता है।

कोर्ट ने कहा, “भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों में विधवा और विधुरों के संपत्ति के अधिकारों की विभिन्न स्थितियों का ध्यान रखा गया है … इस अधिनियम के प्रावधान विभिन्न परिस्थितयों में जहां तक विधवाओं और विधुरों की बात है, उनकी संपत्तियों के विभाजन के बारे में काफी स्पष्ट है…”

कोर्ट ने यह भी कहा कि जहां तक विधवाओं की संपत्ति के बंटवारे की बात है, अधिनयम की धारा 33 (a) के प्रावधान काफी लाभकारी हैं और यह विधवाओं के हितों की रक्षा करने वाला है। रिट याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने अधिनियम के अनेक प्रावधानों का उल्लेख किया और कहा कि इन प्रावधानों के बीच एक बहुत ही सुन्दर और स्पष्ट संतुलन बनाने की कोशिश की गई है।

कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता ने जो मामला अदालत के सामने रखा है  उसमें उसने आरोप लगाया है कि अधिनियम की धारा 33 (b) निरंकुश है और कोर्ट से मृत पति  की संपत्ति का 50 फीसदी हिस्सा उसके किसी आत्मीय को देने के प्रावधान को असंवैधानिक घोषित किये जाने की मांग की है। कोर्ट इस मांग को जायज नहीं मानता। फिर, इस अधिनियम के प्रावधान में अब तक किसी बड़े संशोधन  नहीं हुए हैं और यह समय पर खड़ा उतरा है”

 

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