कर्नाटक चुनाव: सुप्रीम कोर्ट येदुरप्पा के राज्यपाल को भेजे बहुमत पत्र की जांच करेगा, शपथ पत्र पर रोक लगाने से इनकार [आर्डर और याचिका पढ़े]

कर्नाटक चुनाव: सुप्रीम कोर्ट येदुरप्पा के राज्यपाल को भेजे बहुमत पत्र की जांच करेगा, शपथ पत्र पर रोक लगाने से इनकार [आर्डर और याचिका पढ़े]

कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में बीएस येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण के लिए कांग्रेस-जेडी (एस) विधायकों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में आयोजित मैराथन मध्यरात्रि की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें गवर्नर को भेजे गए पत्र को अदालत के समक्ष शुक्रवार को प्रस्तुत  करने का निर्देश दिया जिसमें बीएस येदुरप्पा ने अपना बहुमत दिखाया है। हालांकि अदालत ने गुरुवार को निर्धारित शपथ ग्रहण समारोह पर रोक लगाने से इंकार कर दिया।

 "पार्टियों की सुनवाई के बाद हम मानते हैं कि उत्तरदाता संख्या 3 (येदुरप्पा) द्वारा राज्यपाल को भेजे गए 15 मई, 2018 और 16 मई, 2018 के पत्रों को  प्रस्तुत करना आवश्यक है, जिसका माननीय राज्यपाल के दिनांक16 मई 2018 के संचार में उल्लेख किया गया है।

 हम सुनवाई की अगली तारीख पर इन पत्रों को प्रस्तुत  करने के लिए अटॉर्नी जनरल और / या उत्तरदाता संख्या 3 को अनुरोध करते हैं। यह न्यायालय उत्तरदाता संख्या 3 के शपथ ग्रहण समारोह को रोकने के आदेश को पारित नहीं कर रहा है। मामले में, इस दौरान शपथ ग्रहण की जाती है, जो इस अदालत के आगे के आदेशों और रिट याचिका के अंतिम परिणाम के अधीन होगी ", अदालत के आदेश ने कहा।

याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील डॉ अभिषेक मनु सिंघवी के अनुरोध पर मुख्य न्यायाधीश द्वारा  जस्टिस ए के सीकरी, जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस अशोक भूषण की मध्यरात्रि पीठ का गठन किया गया।

याचिकाकर्ता डॉ जी परमेश्वर, कांग्रेस विधायक और एचडी कुमारस्वामी, जेडी (एस) विधायक की ओर से वकील देवदत कामत, प्रशांत कुमार, जावेद रहमान, आदित्य भट्ट और राजेश इनामदार द्वारा तैयार याचिका गौतम तालुकदार के माध्यम से दायर की गई थी।

 गुरुवार की रात को कर्नाटक के राज्यपाल वाजुभाई वाला ने भाजपा को बी एस येदुरप्पा के नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया, उनके दावे के आधार पर कि उनके पास बहुमत है। डॉ सिंघवी ने तर्क दिया कि कांग्रेस, जेडी (एस) और बीएसपी ने चुनाव परिणामों के बाद गठबंधन बनाया था और सरकार गठन के लिए पहला दावा किया था; हालांकि, राज्यपाल ने उन्हें आमंत्रित नहीं किया और बी एस येदुरप्पा  के नेतृत्व में बीजेपी को आमंत्रित करने का फैसला किया, भले ही उनके पास साधारण बहुमत न हो।

 बीजेपी के पास केवल 104 सीटें थीं, साधारण बहुमत से 8 सीटें कम थीं, और कांग्रेस-जेडी (एस) - बसपा गठबंधन की 116 सीटें थीं।  रामेश्वर प्रसाद बनाम भारतीय संघ (2006) 2 एससीसी 1 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले में यह प्रस्तुत किया गया था कि राज्यपाल का चुनाव के बाद गठबंधन को आमंत्रित करने के लिए कर्तव्य था, जिसने पहली बार बहुमत प्रदर्शित किया था।

 गोवा चुनाव का उदाहरण (चंद्रकांत कवलेकर बनाम भारतीय संघ (2017) 3 एससीसी 758) का भी उल्लेख किया गया था, जहां सुप्रीम कोर्ट  ने गोवा राज्यपाल की कांग्रेस की अनदेखी के बाद भाजपा द्वारा चुनाव के बाद गठबंधन  को आमंत्रित करने के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया था, जबकि कांग्रेस एकल सबसे बड़ी पार्टी थी।

विधानसभा में फ्लोर टेस्ट में बहुमत साबित करने के लिए येदुरप्पा सरकार को 15 दिनों का समय देने वाले राज्यपाल के फैसले को हॉर्स ट्रेडिंग  के लिए एक विस्तृत खिड़की देने के रूप में भी चुनौती दी गई थी।

अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने दलील दी कि संविधान ने राज्यपाल को विवेकपूर्ण शक्तियों के साथ निहित किया है और अदालत राज्यपाल को अपने संवैधानिक कार्यों को निर्वहन से नहीं रोक सकती है। एजी ने यह भी प्रस्तुत किया कि शपथ ग्रहण समारोह पर रोक लगाने  की कोई आवश्यकता नहीं है  क्योंकि कोई अपरिवर्तनीय क्षति नहीं होगी।

बीजेपी के विधायकों के लिए उपस्थित वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि राज्यपाल के खिलाफ कोई आदेश नहीं दिया जा सकता क्योंकि अदालत के पास उन्हें बुलाने या आदेश देने की कोई शक्ति नहीं है। सुनवाई के दौरान पीठ ने व्यक्त किया कि अदालत राज्यपाल को अपने संवैधानिक कार्यों को करने में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।साथ ही  न्यायालय (न्यायमूर्ति बोबडे के माध्यम से बोलते हुए) ने भी सोचा कि  बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय क्यों दिया गया।  सुबह 2 बजे से 5.30 बजे तक लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने शपथ ग्रहण समारोह पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

हालांकिअदालत ने येदुरप्पा को निर्देश दिया कि वह उनके द्वारा राज्यपाल को भेजे गए बहुमत से समर्थन पत्र को शुक्रवार को पेश करें।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शपथ ग्रहण याचिकाओं के परिणाम के अधीन होगा। सुनवाई के बाद डॉ सिंघवी ने एक ट्वीट में सुप्रीम कोर्ट की रात दो बजे से साढ़े तीन घंटे के लिए बैठने की सराहना की |

2015 में सुप्रीम कोर्ट  ने याकूब मेमन की फांसी रोकने  की याचिका सुनने के लिए मध्यरात्रि सुनवाई की थी।