उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सरकार से आईपीसी को संशोधित कर राज्य पुलिस अधिनियम 2007 के तहत गवाहियों के लिए बेहतर सुरक्षा का प्रावधान करने को कहा [निर्णय पढ़ें]

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सरकार से आईपीसी को संशोधित कर राज्य पुलिस अधिनियम 2007 के तहत गवाहियों के लिए बेहतर सुरक्षा का प्रावधान करने को कहा [निर्णय पढ़ें]

गवाहियों के लिए सभी न्यायिक अधिकारियों को हर दिन सुनवाई करने को कहा गया नहीं तो उनके एसीआर में विपरीत टिप्पणी की जाएगी

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि गवाहियों के प्रति ज्यादा आदर दिखाने और जांच और सुनवाई के दौरान इज्जत देने की जरूरत है. हाईकोर्ट ने गवाहियों को गवाही की रिकॉर्डिंग के दिन यात्रा भत्ता देने, उनको पर्याप्त सुरक्षा, उनके घरों में सीसीटीवी और सुरक्षा द्वार लगाए जाने का निर्णय लिया है।

न्यायमूर्ति आलोक सिंह और राजीव शर्मा की पीठ ने राज्य सरकार को उत्तराखंड पुलिस अधिनियम, 2007 की धारा 54 (गवाहियों की सुरक्षा) के तहत छह महीना के भीतर नियम बनाने और आईपीसी में उपयुक्त संशोधन कर ऐसे लोगों को सजा दिलाने के लिए प्रावधान करने को कहा है जो गवाहियों को लालच देकर उनसे झूठी गवाही दिलाते हैं।

कोर्ट ने राज्यों के सभी न्यायिक अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे हर दिन मामले की सुनवाई करें क्योंकि अनावश्यक स्थगन से मामला आगे खिंचता है और गवाहियों के लिए परेशानी पैदा करता है।

तीन लोगों को उम्र कैद की सजा के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई के दौरान ये निर्देश दिए। इन लोगों को एक व्यक्ति मोनू मिश्रा की जुलाई 2008 में हत्या के लिए यह सजा सुनाई गई। इस मामले में दो गवाही मुकर गए थे।

तीनों अपीलकर्ता की सजा को जायज ठहराते हुए कोर्ट ने कहा, “...आरोपी गवाहियों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। गवाहियों को गंभीर परिणामों की धमिकियां दी जाती हैं। इस मामले में भी दो गवाह मुकर गए...पीडब्ल्यू-1 मनोज से नौ महीने के बाद पूछताछ की गई। गवाहियों को सुरक्षा देने की तत्काल जरूरत है ताकि वह निर्भीक होकर गवाही दे सकें।”

कोर्ट ने कहा कि उत्तराखंड की सरकार ने अधिनियम 2007 की धारा 54 जो कि गवाहियों की सुरक्षा से संबंधित है, के तहत उनके लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है जो कि मानवाधिकार सुरक्षा का मामला है।

कोर्ट के निर्देश :




  1. राज्य सरकार को अधिनियम 2007 की धारा 54 के तहत गवाहियों की सुरक्षा का छह महीने के भीतर कानूनी प्रावधान करने का निर्देश। आईपीसी को भी संशोधित करने का निर्देश। ऐसा होने तक:

  2. राज्य सरकार सभी गवाहियों को गवाही की रिकॉर्डिंग के दिन उपयुक्त यात्रा भत्ता देगी। अगर गवाही की रिकॉर्डिंग अगले दिन होनी है तो उनके रहने और खाने पीने की व्यवस्था सरकार करेगी।

  3. पुलिस को निर्देश दिया जाता है कि वे गवाहियों और उनके पारिवार के सदस्यों को जांच और सुनवाई के दौरान और सुनवाई पूरी होने के बाद भी अगर खतरा है तो सुरक्षा देने का निर्देश।

  4. राज्य सरकार को जघन्य और संवेदनशील मामलों में गवाहियों का लघु और दीर्घ अवधि के आधार पर बीमा करने का निर्देश ताकि वे निडर होकर गवाही दे सकें।

  5. उत्तराखंड के सभी आपराधिक अदालतों को हर दिन सुनवाई करने को कहा गया है। रिपोर्टिंग अधिकारियों को कहा गया है कि ऐसा नहीं करने वाले न्यायिक अधिकारियों के वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में विपरीत टिप्पणी करें।

  6. गवाहियों की सुरक्षा के लिए उनके घरों में सुरक्षा दरवाजा, सीसीटीवी कैमरे, अलार्म और घेरे आदि लगाने का निर्देश।

  7. पुलिस के पास गवाहियों के ऐसे नंबर होने चाहिएं ताकि वे उनसे आपातकाल में संपर्क कर सकें, उनको सुरक्षा दे सकें और उनके घरों की गश्त लगा सकें और उनको कोर्ट से घर तक सरकारी गाड़ी में लाने और ले जाने की सुविधा हो।

  8. सुनवाई के दौरान कोर्ट में गवाहियों के बैठने और आराम करने के लिए अलग कमरे की व्यवस्था हो।

  9. जघन्य/संवेदनशील मामलों में अगर गवाही इस तरह का आग्रह करता है तो राज्य सरकार को गवाहों की पहचान छिपाने का निर्देश।


इन निर्देशों के बारे में बताने से पहले कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय पुलिस आयोग की चौथी रिपोर्ट के अनुसार गवाहियों के लिए बहुत कम भत्ते का प्रावधान है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 96,815 गवाहियों में से सिर्फ 6,697 को ही कुछ भत्ते दिए गए और इसके लिए भी बहुत लंबी प्रक्रिया अपनाई जाती है।