आईपीसी की धारा 377 को रद्द करने की व्यवसायी केशव सूरी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा

आईपीसी की धारा 377 को रद्द करने की व्यवसायी केशव सूरी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा

सुप्रीम कोर्ट ने आज केशव सूरी द्वारा दायर याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। शीर्ष व्यापारी और ललित होटल के कार्यकारी निदेशक ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 को रद्द करने की मांग की हैं जो समलैंगिकता को अपराध घोषित करता है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चन्द्रचूड ने कहा कि याचिका को पांच लोगों द्वारा दायर की गई संयुक्त याचिका के साथ टैग किया जाएगा जिसे संविधान बेंच के समक्ष भेजा गया है।

पीठ ने कहा, "इस याचिका की एक प्रति एएसजी को दी जानी चाहिए और केंद्र एक सप्ताह के भीतर प्रतिक्रिया दर्ज करेगा।”

सूरी का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने किया जबकि एएसजी तुषार मेहता केंद्र के लिए उपस्थित थे। सूरी जो खुद LGBT समुदाय का हिस्सा हैं, ने कहा कि वह लगातार झूठे अभियोजन पक्ष के खतरे में रहते हैं और इसलिए, वह गरिमा से जीवन जीने में असमर्थ है, जिससे वह अपने साथी के साथ यौन संबंध रखने के लिए अपनी पसंद का प्रयोग नहीं कर सकते ।

धारा 377 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर पीआईएल की सूची में शामिल होने वाली सूरी की याचिका नवीनतम है। जबकि नाज़ फाउंडेशन द्वारा दायर की गई उपचारात्मक याचिका पहले ही लंबित है,  व्यवसायीआयशा कपूर, भरतनाट्यम नर्तक और 2014 संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्तकर्ता नवतेज सिंह जौहर, प्रसिद्ध पत्रकार सुनील मेहरा, प्रसिद्ध शेफ, लेखक  और टीवी व्यक्तित्व रितु डालमिया और और इतिहासकार व लेखक अमन नाथ ने पिछले साल जनवरी में संयुक्त याचिका दायर की थी जिसे सुनवाई के लिए संविधान बेंच के समक्ष भेजा गया है।

 दूसरी तरफ सूरी की याचिका में दावा किया गया: " आईपीसी की धारा 377 के कारण LGBT  समुदाय के विभिन्न वयस्क और सहमति  के बावजूद सदस्यों को झूठ के खतरे का सामना करना पड़ता है और कुछ वास्तव में इसका सामना कर रहे हैं, " सुरी ने उच्चतम न्यायालय से अनुरोध किया कि वह याचिका की अंतिम सुनवाई और निपटान कर प्रतिवादी (भारत संघ) को इसे रोकने के आदेश को पारित करने का आदेश दे।

 सूरी ने कहा कि वह आपसी सहमति से पिछले एक दशक से अपने एक वयस्क सहयोगी के साथ रह रहे हैं और वे देश के समलैंगिक, गे, बाईसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीयर समुदाय के अंग हैं।

 इस उद्योगपति ने अपनी याचिका में कहा है कि अपनी यौन पसंद की वजह से उन्हें भेदभाव झेलना पड़ रहा है।

यह गौर करने वाली बात है कि सूरी ने “प्योर लव” नाम से सामाजिक अभियान चलाया था जिसका ध्येय विशेषकर LGBT समुदायको एक ऐसा मंच उपलब्ध कराना था जहाँ पर वे अपने जीवन के अनुभवों को साझा कर सकें।

याचिका में कहा गया है कि देश में भारी संख्या में लोगों के साथ भेदभाव नहीं होने दिया जा सकता और उनको उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता और समलैंगिकों का अपराधीकरण का आधार कलंक है और इसी कलंक को देश की विधि व्यवस्था आगे बढ़ा रही है।

इससे पहले 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने धारा 377 को रद्द  कर दिया था लेकिन आदेश को बाद में सुप्रीम कोर्ट के खंडपीठ ने रद्द  कर दिया था।एक अप्राकृतिक अपराध के रूप में वर्गीकृत, एक ही लिंग के व्यक्तियों के बीच सहमति यौन संभोग को आईपीसी की धारा 377 के तहत 'प्रकृति के आदेश के खिलाफ' कहा गया है और ये आजीवन कारावास तक दंडनीय किया जा सकता है।