सेवानिवृत्ति की उम्र में अस्थाई वृद्धि को एकपक्षीय रूप से वापस लेना गैरकानूनी : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

सुप्रीम कोर्ट ने पारादीप फॉस्फेट्स लिमिटेड बनाम उड़ीसा राज्य मामले में कहा कि कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति में बढ़ोतरी के निर्णय को एकपक्षीय रूप से वापस लेना अधिनियम की धारा 9A का उल्लंघन है। यह वृद्धि अस्थाई प्रकृति का था।

मामला

सरकार ने 19 मई 1998 को केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र को 58 से बढ़ाकर 60 करने का निर्णय लिया था और यह दलील दी गई थी कि इससे कंपनियों को अपना घाटा कम करने में मदद मिलेगी।

बाद में, सरकार ने 22 अगस्त 2001 को इस निर्णय को वापस लेने का निर्णय लिया।

कानूनी प्रक्रिया

औद्योगिक अधिकरण और बाद में उड़ीसा हाई कोर्ट ने कंपनी के इस कदम को अनुचित ठहराया और कहा कि यह अधिनियम की धारा 9A का उल्लंघन है जिसमें कहा गया है कि नियोक्ता को कर्मचारियों को इसकी पूर्व सूचना देनी चाहिए थी।

इन आदेशों को चुनौती देते हुए कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और कहा कि सिर्फ इसलिए कि 1998 से 2002 के बीच 60 साल की उम्र में रिटायर किए गए कर्मचारियों को दिए गए लाभ का मतलब यह नहीं है कि सेवानिवृत्ति की अवधि बदल जाएगी जैसा कि सेवा नियमों में कहा गया है।

कोर्ट के सामने मुद्दा यह था कि कंपनी के घाटे को नियंत्रित करने के लिए सेवानिवृत्ति की उम्र को बढ़ाना जो कि अस्थाई प्रकृति का था, क्या यह कहा जा सकता है कि इसको वापस लेने का अर्थ रिवाजतन छूट या विशेषाधिकार या उपयोग में बदलाव को वापस लेना है।

कोर्ट ने कहा कि जब कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की अवधि में बढ़ोतरी को लागू की गई तो यह कर्मचारियों को मिला विशेषाधिकार जैसा था क्योंकि इससे कर्मचारियों को विशेष अधिकार मिले।

हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए पीठ ने कहा, “…(कंपनी के) बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स ने सेवानिवृत्ति की उम्र को बढाने का निर्णय किया जो 27-5-1998 को लागू हो गया…हालांकि इस निर्णय को नियमों और स्थाई आदेशों को संशोधित किए बिना लागू किया गया, पर इसे कर्मचारियों की सेवा की शर्तों का हिस्सा माना गया। सेवानिवृत्ति सेवा की शर्तों का अभिन्न हिस्सा है। इस उम्र में वृद्धि विशेषाधिकार में वृद्धि है क्योंकि यह विशेषकर केंद्र सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों को ही मिला था”।

काम का अधिकार कर्मचारियों को सुने बिना नहीं छीना जा सकता

कोर्ट ने कहा कि यह कहना कि सेवानिवृत्ति की उम्र में बढ़ोतरी इसलिए की गई कि कंपनियों का घाटा कम करना भर था और इसलिए उसने कर्मचारियों के वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया है, क़ानून सम्मत नहीं है और यह कम्पनी को इस बात का लाइसेंस नहीं देता कि वह क़ानून के खिलाफ काम करे।

यहां निर्णय पढ़ें

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