लेक पैलेस रिसॉर्ट केस : सुप्रीम कोर्ट ने थॉमस चांडी को SC से अर्जी वापस ले हाईकोर्ट जाने की इजाजत दी

 लेक पैलेस रिसॉर्ट के मामले में केरल हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एस ए बोबड़े और जस्टिस एल नागेश्वर राव की पीठ ने केरल के पूर्व मंत्री थॉमस चांडी को याचिका वापस लेने और फिर से केरल हाईकोर्ट जाने की अनुमति दे दी।

सोमवार को सुनवाई के दौरान चांडी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने बेंच से कहा कि केरल हाईकोर्ट का आदेश था कि कोई मंत्री अपनी सरकार के खिलाफ कोर्ट नहीं जा सकता। लेकिन चांडी मंत्री पद छोड चुके हैं। इसलिए वो हाईकोर्ट जा सकते हैं।

बेंच ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस लेकर हाईकोर्ट में फिर से अर्जी दाखिल करने की इजाजत दे दी।

ये मामला रिसॉर्ट के लिए जमीन आवंटन से जुडा है।दरअसल नवंबर 2017 में केरल हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा था कि एक मंत्री अपनी ही सरकार या इसके पदाधिकारियों के खिलाफ हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल करने के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकता। हाईकोर्ट ने दो अलग अलग लेकिन सहमति से ये फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी मंत्री अपने पद पर रहते हुए अपनी ही सरकार या इसके नुमाइंदों के कार्य पर अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दाखिल नहीं कर सकता।

दरअसल हाईकोर्ट केरल के मंत्री थॉमस चांडी की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। चांडी ने जिला कलेक्टर की उस रिपोर्ट को चुनौती दी थी जिसमें केरल कंजर्वेशन ऑफ पैडी लैंड एंड वेट लैंड एक्ट, 2008 के तहत आने वाली जमीन को प्रावधानों का उल्लंघन कर खुद का दावा करने पर मंत्री का नाम लिया गया था। जिला कलेक्टर ने ये रिपोर्ट राजस्व विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को भेजी थी।

वहीं चांडी की दलील थी कि जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है, वो जमीन के मालिक नहीं हैं। याचिकाकर्ता ने कहा कि जिला कलेक्टर ने ये रिपोर्ट राजस्व मंत्री के निर्देशों पर राजस्व विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के कहने पर बनाई थी जिसमें उस शिकायत की जांच के लिए कहा गया था कि उक्त जमीन पर लेक पैलेस रिसार्ट चलाने वाली कंपनी वाटर वर्ल्ड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड पर आरोप लगाए गए थे। हालांकि याचिकाकर्ता ने माना कि वो केरल में काउंसिल मंत्री हैं।

जस्टिस पीएन रविंद्रन ने याचिका को सुनवाई योग्य ना होने के आधार पर खारिज करते हुए कहा कि जब तक याचिकाकर्ता सरकार में मंत्री हैं वो सरकार या किसी भी अफसर के कार्यों पर रोक लगाने के लिए रिट याचिका दाखिल करने के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकते।

अपने फैसले में उन्होंने कहा कि केरल सरकार के कैबिनेट में मंत्री होने के चलते वो सरकार की विधानसभा कैबिनेट के साथ हर मामले में सामूहिक जवाबदेह हैं।हालांकि उन्होंने याचिकाकर्ता को छूट दी कि अगर रिपोर्ट से उनकी कोई शिकायत है तो वो जिला कलेक्टर के सामने बात रख सकते हैं।

जस्टिस दीवान रामाचंद्रन ने अपने फैसले में कहा कि मंत्री पद पर रहते हुए कोई भी व्यक्ति कैबिनेट की सामूहिक जवाबदेही से सिद्धांत से बाहर नहीं जा सकता। ये सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद 164 और 75 में दिया गया है जिसके मुताबिक कैबिनेट का कोई भी सदस्य सरकार के किसी भी निर्णय का सावर्जनिक तौर पर समर्थन करेगा, भले ही वो निजी तौर पर इससे सहमत ना हो। बेंच ने कहा कि अनुच्छेद 164 (2) के तहत कैबिनेट को एक साथ ही माना जाता है और विधायिका में ऐसी स्थिति नहीं आनी चाहिए जब कैबिनेट का एक सदस्य खुद ही फैसला ले जो दूसरों से मतभेद में हो और विधायिका में अव्यवस्था फैला दे। उन्होंने कहा कि कोई भी मंत्री अपनी ही सरकार के फैसले या उसके हितों के खिलाफ नहीं जा सकता और ना ही वो ये कहकर रिट का अधिकार पा सकता है कि वो एक सामान्य नागरिक है। मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जिला कलेक्टर ने कंपनी के खिलाफ रिपोर्ट बनाई थी और याचिकाकर्ता ने माना है कि वो कंपनी में नॉन- एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं। रिपोर्ट में जिला कलेक्टर ने निजी तौर पर कुछ नहीं कहा है और कंपनी के खिलाफ जांच व कार्रवाई की सिफारिश की है। बेंच ने कहा कि लगता है याचिकाकर्ता को कानूनी कार्रवाई से ज्यादा मीडिया और राजनीतिक विरोधियों की चिंता है। हाईकोर्ट ने कहा था कि सिर्फ रिपोर्ट में नाम आने से याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई दोष नहीं दिखता। साथ ही बेंच मे जिला कलेक्टर को कहा है कि वो कानून के मुताबिक अपनी रिपोर्ट पर आगे कार्रवाई करे।

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