केरल हाईकोर्ट में राजनीतिक दलों के विदेशी चंदे के प्रावधान को चुनौती दी गई [याचिका पढ़े]

केरल उच्च न्यायालय में  देश में चुनाव में राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को चंदा देने के लिए कंपनियों और विदेशी संस्थानों को अनुमति देने वाले प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती एक याचिका दाखिल की गई है।

विक्टर टी थॉमस द्वारा दायर की गई याचिका में कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 182, जनप्रतिनिधि अधिनियम  1951 की धारा 29 बी और विदेशी अंशदान में चुनौती देती है। (विनियमन) अधिनियम, 2010 की धारा 2 (1) (जे) (vi) के प्रावधानों को चुनौती दी गई है।

   हालांकि 2017 से पहले कंपनी अधिनियम की धारा 182 एक कंपनी को पिछले तीन वर्षों के औसत लाभ के 7.5% तक राजनीतिक दलों को योगदान करने की इजाजत देती थी, लेकिन  इस सीमा को अब हटा दिया गया है।इसलिए चंदे की राशि असीमित हो सकती है। जनप्रतिनिधि अधिनियम  की धारा 29बी राजनीतिक दलों को योगदान स्वीकार करने का अधिकार देता है।

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम की धारा 2 (1) (जे) (vi) के प्रावधान 1976 से पूर्वव्यापी प्रभाव के साथ राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त विदेशी चंदे की जांच से छूट देता है।

 इन प्रावधानों को चुनौती देते हुए थॉमस ने आरोप लगाया कि राजनीतिक दलों ने कॉर्पोरेट और विदेशी संस्थानों से चंदा  प्राप्त करने से  “संस्थान” के “प्रतिनिधियों” के रूप में कार्य करने के लिए “बाध्य” होगा।

उन्होंने प्रस्तुत किया, “… इन कंपनियों और विदेशी संस्थानों से धन की प्राप्ति के द्वारा यह निश्चित है कि राजनीतिक दल के निर्वाचित उम्मीदवार जो सरकार बनाते हैं, वे इन कंपनियों और विदेशी संस्थानों और राजनीतिक और आर्थिक नीतियों और विनियमों का समर्थन करते हैं और परिणामस्वरूप भारत के नागरिक हारते हैं और बड़े पैमाने पर यह भारतीय लोकतंत्र की विफलता है। “

 वह तर्क देते हैं कि अध्यारोपित प्रावधान भारत के संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन करते हैं। वो कहते हैं, “लोकतंत्र हमारे संविधान की बुनियादी और मौलिक विशेषता है। लोकतंत्र एक समानतावादी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने की इच्छा रखता है। चुनाव के वित्तपोषण की अपारदर्शिता और अधिकतम सीमा कॉरपोरेट निधि और राजनीतिक दलों के लिए विदेशी निधि का प्रभाव हमारे राष्ट्र की लोकतांत्रिक राजनीति के लिए बड़ा खतरा है। “

थॉमस ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन बताते हुए कहा, “… कॉर्पोरेट कंपनियों के विभिन्न क्षेत्र हैं और इन कॉर्पोरेट संस्थाओं के बड़े, छोटे और मध्यम क्षेत्र हैं। अब यह देखा गया है कि यह विभिन्न क्षेत्रों में बड़े कॉर्पोरेट क्षेत्र हैं वो राजनीतिक दलों को चंदा देते हैं और कहा जाता है कि कॉर्पोरेट को सरकार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सहायता करती है। कॉर्पोरेट क्षेत्र जो चंदा नहीं देते हैं, उन्हें सरकारों से अनुचित सहायता या लाभ नहीं मिल सकता। जिन कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को फंड नहीं किया जाता,  वे धीरे-धीरे बाजार से समाप्त हो जाएंगे क्योंकि निर्वाचित सरकार और निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा अनुचित पक्षपात किया जाएगा। इस प्रकार कंपनियों जो फंड नहीं करते उनसे अनुच्छेद 14 के तहत भेदभाव किया जाएगा और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के तहत सिद्धांतों का उल्लंघन भी होगा। “

इसके अलावा उन्होंने तर्क दिया कि प्रभावित प्रावधान निष्पक्ष चुनाव कराने को लेकर  नागरिकों के अधिकारों को भ्रष्ट करते हैं।

यह प्रस्तुत करते हुए, “चुनाव के गणित के बाद यह होगा कि भारतीय कंपनियों और विदेशी संस्थानों का निर्वाचित सरकार पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण होगा और निर्वाचित प्रतिनिधियों जिससे उनके पक्ष में नीतियों और नियमों को प्रभावित किया जा सकता है और यह नागरिकों के कल्याण के लिए बड़ी हानि होगी। “

थॉमस ने मांग की कि अनुचित प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित किया जाए और अंतरिम राहत के रूप में याचिका के लंबित रहने तक राजनैतिक दलों को चंदा देने के लिए कंपनियों  और विदेशी संस्थानों को निषिद्ध किया जाए।

 

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