अदालत से 1750 किमी दूर रहने वाले आरोपी को कोर्ट में मौजूद रहने से छूट नहीं देने के मजिस्ट्रेटी आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त किया [निर्णय पढ़ें]

अदालत से 1750 किमी दूर रहने वाले आरोपी को कोर्ट में मौजूद रहने से छूट नहीं देने के मजिस्ट्रेटी आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त किया [निर्णय पढ़ें]

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में एक मजिस्ट्रेट के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसमें हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले आरोपी को अदालत में मौजूद रहने से छूट नहीं दी गई थी। आरोपी के खिलाफ एक महिला ने धारा 498A के तहत मामला दर्ज किया है।

महिला ने पति, सास-श्वसुर और अन्य रिश्तेदारों के खिलाफ पटना में एक मजिस्ट्रेट के समक्ष मामला दायर किया। दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 और सीआरपीसी की धारा 498A के तहत प्रथम दृष्टया मामले को देखते हुए कोर्ट ने आरोपी को अदालत में बुलाया। मजिस्ट्रेट ने आरोपियों के अदालत में खुद पेश होने और उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट को निरस्त करने की अपील ठुकरा दी। मजिस्ट्रेट ने इसके लिए निम्नलिखित कारण बताए थे -




  • याचिकाकर्ता स्वस्थ और प्रसन्न हैं और वे लोग किसी बीमारी से ग्रस्त नहीं हैं कि अदालत नहीं आ सकें।

  • अपराध की प्रकृति ऐसी है कि उनको शिकायतकर्ता के साथ हर दिन अदालत में उपस्थित रहना चाहिए।

  • किसी भी तरह के आपसी समझौते की संभावना के लिए भी उनका अदालत में मौजूद होना वांछनीय है।


आरोपियों ने पटना हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया पर वहाँ से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली।

सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायाधीश एके सिकरी और अशोक भूषण की पीठ ने कहा कि आरोपियों ने न्यायालय में उपस्थित नहीं होने के जो आधार गिनाए हैं वे पर्याप्त हैं और उनको निजी स्तर पर अदालत में उपस्थित होने से छूट मिलनी चाहिए। कोर्ट ने कहा, “मजिस्ट्रे ने आरोपियों के अपील पर ध्यान नहीं दिया। हाई कोर्ट के समक्ष यह रिकॉर्ड है कि सुनवाई अदालत और आरोपी के निवास स्थल के बीच की दूरी 1750 किलोमीटर है”।

पीठ ने निजी रूप से अदालत में उपस्थित नहीं होने के उन आधारों की जांच की जिसको मजिस्ट्रेट ने रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा, “मजिस्ट्रे ने पहला कारण यह बताया है कि सभी आरोपी स्वस्थ और प्रसन्नचित्त हैं और इनमें से कोई भी बीमार नहीं है कि अदालत नहीं आ सकें। आरोपियों ने शारीरिक बीमारी की वजह से अदालत में मौजूद होने से छोट नहीं माँगी थी इसलिए मजिस्ट्रे का यह कारण बताना मायने नहीं रखता। दूसरा कारण यह बताया गया कि आरोपियों के लिए यह बेहतर होगा कि वे सुनवाई के हर मौकों पर अदालत में उपस्थित रहें। हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि मजिस्ट्रे ने अदालत में नहीं आने के लिए इसको उचित आधार क्यों नहीं समझा। तीसरा आधार था मेल मिलाप का जिसके लिए दोनों पक्षों का मौजूद होना जरूरी है। यह स्पष्ट है कि पति अर्नेश कुमार ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत आवेदन नहीं दिया था जिसकी गिरफ्तारी-पूर्व जमानत याचिका पहले ही रद्द कर दी गई थी। इस तरह वर्तमान अपीलकर्ता पति अर्नेश कुमार सीआरपीसी की धारा 482 के तहत आवेदन नहीं किया था जो कि इस कार्यवाही में आराम से शरीक हो सकता था। इसलिए उपरोक्त आधार भी उसके आवेदन को रद्द करने का आधार नहीं बनता”।

कोर्ट ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट ने भी यह निष्कर्ष निकालकर तथ्यात्मक गलती की कि आरोपी ने सीआरपीसी की धारा 205 के तहत आवेदन दिया है।