सिक्किम हाई कोर्ट की पूर्ण पीठ ने कहा, शपथ के तहत आरोपी का इकबालिया बयान लेना असंवैधानिक [निर्णय पढ़ें]

सिक्किम हाई कोर्ट की पूर्ण पीठ ने सिक्किम राज्य बनाम सुरेन राय मामले में कहा कि सीआरपीसी की धारा 164 के तहत किसी आरोपी का इकबालिया बयान रिकॉर्ड करने के समय उसको शपथ दिलाना संविधान के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन है।

मुख्य न्यायाधीश सतीश के अग्निहोत्री ने कहा कि शपथ के तहत किसी आरोपी का इकबालिया बयान लेना घातक है और यह सीआरपीसी की धारा 463 के तहत संरक्षित नहीं है।

पीठ ने कहा कि किसी आरोपी का शपथ के तहत इकबालिया बयान लेने का प्रभाव इसकी स्वैच्छिकता पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ता है और स्वैच्छिकता पवित्र होती है। “…किसी आरोपी से शपथ के तहत इकबालिया बयान लेने के विनाशकारी परिणाम होंगे”।

न्यायमूर्ति भास्कर राज प्रधान ने पूर्ण पीठ की और से कहा, “जब एक मजिस्ट्रेट बयान लेने के लिए बैठता है तो क़ानून के तहत मजिस्ट्रेट की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह आरोपी के मन पर किसी भी तरह का बाहरी दबाव नहीं बनने दे। ऐसा करते हुए अगर मजिस्ट्रेट आरोपी से शपथ के तहत बयान दर्ज करता है तो ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मजिस्ट्रेट ने क़ानून के हिसाब से काम किया और इस तरह से उसने इकबालिया की स्वैच्छिकता को सुनिश्चित किया”।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कतिपय फैसलों का जिक्र किया और कहा कि सीआरपीसी की धारा 164 और 281 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि इकबालिया बयान शपथ के तहत रिकॉर्ड किया जाए। फिर, अधिनियम 1969 की धारा 4 स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी आरोपी को शपथ नहीं दिलाया जाएगा और किसी आपराधिक प्रक्रिया में ऐसा करना तो गैरकानूनी होगा बशर्ते कि आरोपी से बचाव पक्ष के गवाह के रूप में पूछताछ की जा रही है।

शपथ के तहत किसी आरोपी से इकबालिया बयान लेने का अर्थ यह होगा कि यह इकबालिया बयान स्वैच्छिक नहीं है और इस तरह यह सीआरपीसी की धारा 164 का उल्लंघन होगा और इस वजह से घातक भी।

 

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