सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति की 14 साल की लड़की से सामूहिक बलात्कार के मामले की सीबीआई से जांच कराने की याचिका उड़ीसा हाई कोर्ट को वापस भेजी

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति की 14 साल की लड़की से सामूहिक बलात्कार के मामले की सीबीआई से जांच कराने की याचिका उड़ीसा हाई कोर्ट को वापस भेजी

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश आदर्श कुमार गोएल और यूयू ललित की पीठ ने अनुसूचितजाति की एक 14 साल की लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मामले की जांच सीबीआई से कराने की याचिका उड़ीसा हाई कोर्ट को वापस कर दिया है। कोरापूत की इस लड़की ने बाद में आत्महत्या कर ली थी। कोर्ट ने कहा कि इसी तरह की और याचिकाएं हाई कोर्ट में लंबित हैं इसलिए वह इस याचिका को वापस हाई कोर्ट के पास भेज रहा है।

 पीठ ने यह आदेश उस समय दिया जब सरकारी वकील ने यह कहा कि ऐसी ही दूसरी याचिकाएं भी हाई कोर्ट में लंबित हैं।

पीट ने कहा, “अगर हाई कोर्ट में याचिकाएं लंबित नहीं होतीं तो वह इस याचिका पर खुद ही सुनवाई करता।”

इस लड़की ने न्याय नहीं मिलने से आजिज आकर अपनी जान ले ली थी।

गत वर्ष 10 अक्टूबर को लड़की ने आरोप लगाया था कि कुंदुली नामक स्थान पर यूनिफ़ॉर्म पहने चार लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया था जब वह नक्सल प्रभावित जिला कोरापुत में अपने गाँव मुसौगुडा वापस आ रही थी।

हालांकि बाद में राज्य पुलिस ने दावा किया था कि उस लड़की के साथ बलात्कार हुआ ही नहीं था जिसके बाद इस मामले ने वहाँ राजनीतिक रंग ले लिया।

भगबान छट्टी ने याचिका दायर की थी और उसने निम्नलिखित आधार पर इस मामले की सीबीआई जांच की मांग की :




  1. पुलिस यूनिफ़ॉर्म में कुछ लोगों ने 14-15 साल की एक लड़की के साथ लेंजिगुडा घाटी, कोरापुत, ओडिशा में उसके साथ 10 अक्टूबर 2017 को बलात्कार किया। लड़की अनुसूचित जाति की थी। इसके बाद पुलिस ने उसके साथ बदसलूकी की और उस पर दबाव डाला कि वह अपना बयान बदल ले और शिकायत वापस ले ले। पीड़िता ने घटना के बाद अपनी जान लेने की कोशिश की पर वह सफल नहीं हुई पर दूसरी बार उसने ऐसा कर डाला।

  2. पुलिस महानिदेशक ने बाद में बयान जारी कर कहा कि इस सामूहिक बलात्कार में पुलिस वाले शामिल नहीं हैं।

  3. आत्महत्या करने से पहले पीड़िता ने पुलिस महानिदेशक के खिलाफ आरोप लगाया था कि उसे अपना बयान बदलने के लिए सादे कागज़ पर हस्ताक्षर करने को कहा। पीड़िता के परिवार वालों को पुलिस ने डराया-धमकाया और कहा कि वे उसे नक्सली साबित कर देंगे। इससे यह पता चलता है कि पुलिस का आला अधिकारी इस अपराध की लीपापोती में शामिल थे।

  4. इस मामले की जांच करने वाली पुलिस का व्यवहार यह बताता है कि उनका इसमें हित था और वे ठीक से जांच नहीं कर रहे थे जिसके बाद वहाँ लोगों ने प्रदर्शन भी किया। इससे पुलिस की साख को वहाँ नुकसान पहुंचा।

  5. इस स्थिति में स्थानीय पुलिस से निष्पक्षता की उम्मीद नहीं की जा सकती है क्योंकि वह इस पूरे मामले को झूठा साबित करने पर तुली है।

  6. पुलिस ने पीड़िता की मेडिकल साक्ष्य से छेड़खानी की। 16 अक्टूबर 2017 की उसकी एसएफएसएल रिपोर्ट यह साबित करती है कि उसके साथ बलात्कार हुआ पर 23 अक्टूबर को इसके विपरीत रिपोर्ट पेश की गई और कहा गया कि इससे पहले जारी रिपोर्ट प्राथमिक थी और इसको विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।

  7. पुलिस महकमा जाँच मनमाने ढंग से कर रहा है और मनमाना निष्कर्ष निकाल रहा है और कोर्ट को उचित कार्रवाई के लिए मूल रिपोर्ट नहीं पेश कर रहा है।

  8. पूरी जांच में लीपापोती की गई है और इस मामले की निष्पक्ष जांच की ज़रूरत है।