आधार पर 10वें दिन की बहस [सत्र 1]: आधार नहीं होने के कारण किसी को आजीविका के उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता; सिबल ने कहा, आधार प्रोजेक्ट अनुच्छेद 14 और 21 पर खड़ा नहीं उतरता

आधार पर 10वें दिन की बहस मंगलवार को हुई और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने पांच जजों की संविधान पीठ के समक्ष दो याचिकाकर्ताओं की ओर से अपना पक्ष रखा। उन्होंने इस्राइल के बायोमेट्रिक डाटाबेस लॉ के साथ आधार अधिनियम 2016 की तुलना की।

सिबल ने कहा, “आधार अधिनियम के उलट इस्राइली क़ानून के तहत आईडी कार्ड स्वैच्छिक है। आधार के विपरीत इस्राइल के क़ानून में सहमति की अवधारणा छलावा नहीं है। इस्राइल में लोगों से जमा किए गए बायोमेट्रिक डाटा सिर्फ एक निश्चित अवधि के लिए उसी कार्य के लिए ही प्रयोग हो सकता है जिसके लिए उसे इकट्ठा किया गया है और इस डाटा का किसी विशेष स्थिति में ही प्रयोग करने की इजाजत है। फिर वहाँ मेटाडाटा का संग्रहण भी नहीं होता है।

उन्होंने कहा कि सब्सिडी, लाभ और सेवाओं के साथ साथ कई अन्य हकदारियों को आधार के साथ जोड़ दिया गया है। क्या उसमें अब सहमति का कोई महत्त्व रह गया है?

सिबल ने कहा कि आधार के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए पहचान और सत्यापन को सार्वजनिक किया जा सकता है और इस प्रावधान का दुरूपयोग हो सकता है।

सिबल ने कहा कि “सूचना शक्ति है” और न्यायमूर्ति केएस पुत्तस्वामी मामले में जो फैसला दिया गया है उसके अनुसार, “हमारा युग सूचना का युग है। सूचना ज्ञान है। पुरानी कहावत कि ‘सूचना शक्ति है’ का किसी व्यक्ति की स्थिति के लिए इसका बहुत ही बड़ा निहितार्थ है क्योंकि पार्ट एस डाटा सर्वव्यापी है। और यह सर्वर्त्र मौजूद है।“

सिबल ने इस फैसले से उद्धृत करते हुए कहा, “ऊबर” दुनिया की सबसे बड़ी टैक्सी कंपनी है, पर उसके पास कोई टैक्सी नहीं है। फेसबुक जो कि दुनिया का सबसे ज्यादा लोकप्रिय मीडिया है कोई कंटेंट तैयार नहीं करता। “अलीबाबा” के पास कोई इन्वेंटरी नहीं है। और एयरबीएनबी जो कि दुनिया का सबसे बड़ा एकोमोडेशन उपलब्ध कराने वाला है, उसके पास कोई रियल एस्टेट नहीं है।” उन्होंने कहा कि दुनिया में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो बहुत ही दिलचस्प है।

सूचना के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने हारवर्ड बिजनेस रिव्यु में फेसबुक द्वारा व्हाट्सअप को खरीदने के बारे में एक चर्चा का भी जिक्र किया ।

उन्होंने कहा कि वैसे इन सेवा प्रदाताओं के पास जो सूचनाएं हैं वे बिखरी हुई हैं। उन्होंने फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि लेकिन एक पूर्ण प्रोफाइल के लिए विभिन्न हेड्स के तहत सूचनाओं का संग्रहण एक ख़तरा है…एक व्यक्ति द्वारा किया गया प्रत्येक कारोबार और वह जितने भी साइट्स पर जाता है, वह वहाँ अपना इलेक्ट्रोनिक ट्रैक छोड़ जाता है और सामान्यतया लोगों को इसकी जानकारी नहीं होती। इन इलेक्ट्रॉनिक ट्रैक्स में शक्तिशाली सूचनाओं के माध्यम होते हैं। अलग-अलग तो ये सूचनाएं महत्त्वहीन लगते हैं। पर जब इनको इकट्ठा किया जाता है तो ये लोगों के व्यक्तित्व – उनके खाने-पीने की आदतें, उनकी भाषा, स्वास्थ्य, शौक, सेक्सुअल प्रेफरेंसेज, दोस्ती, पहनावे और उनके राजनीतिक सरोकारों के बारे में बताते हैं।

एक ओर तो इस स्कीम के बारे में कहा जाता है कि इसका उद्देश्य जनहित है जबकि दूसरी ओर गोपनीय निजी सूचनाएं सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध कराए जा रहे हैं। कोई कहाँ और कैसे यात्रा कर रहा है इसका जनहित से क्या लेना देना है। उन्होंने हाल की एक घटना का जिक्र किया जिसमें एक महिला को एक अस्पताल के बाहर अपने बच्चे को जन्म देना पड़ा क्योंकि आधार नहीं होने की वजह से उसे अस्पताल ने जगह नहीं दी।

सिबल ने इस बात से सहमति जताई कि सरकार राष्ट्रीय आईडी योजना को लागू कर सकती है पर उन्होंने संवेदनशील बायोमेट्रिक और जनसांख्यिकीय डाटा के संग्रहण और उसको एक केंद्रीकृत डाटाबेस में रखने और हर बार उसके प्रयोग पर सत्यापन की अनिवार्यता पर अफ़सोस जाहिर किया। उन्होंने कहा, “एक निकाय में सभी सूचना को जमा करना उस निकाय को नियंत्रण के लिए बहुत बड़ी शक्ति देना हुआ”।

आधार अधिनियम की धारा 3 की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यद्यपि क़ानून आधार को मुफ्त और स्वैच्छिक बताता है पर यह अनिवार्य बन गया है।

फिर, यद्यपि धारा 32(3) यूआईडीएआई को सत्यापन के लिए किसी तरह का डाटा रखने से रोकता है, पर 2016 के विनियमन के तहत अथॉरिटी को कारोबार का मेटाडाटा स्टोर करने को कहता है।

सिबल ने इसके बाद कहा कि हर क़ानून और नीति निर्णय को सामानुपातिकता की जांच पर खड़ा उतरना होता है – “पहला, उद्देश्य और लक्ष्य जिसके लिए नीति या क़ानून को बनाया गया है, को ध्यान में रखना जरूरी है और दूसरा, यह देखा जाना है कि इस तरह के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए क़ानून सर्वाधिक कम प्रतिबंधकारक हो। अधिनियम 2016 ने राज्य प्राधिकरणों को काफी व्यापक अधिकार दे दिए हैं। सब्सिडी, लाभ और सेवाओं तथा आधार के बीच कोई संबंध नहीं है। यह सामानुपातिकता की भावना के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि जो राज्य खाद्यान्नों की चोरी नहीं रोक पाए उनको अब संवेदनशील सूचनाओं का चौकीदार बना रहे हैं।

इस बारे में न्यायमूर्ति एके सिकरी ने “औचित्य की संस्कृति” का जिक्र किया जैसा कि दक्षिण अफ्रीका में प्रचलित है जहाँ सभी सरकारी कार्यों का औचित्य और उसका कारण बताना पड़ता है।

अधिनियम 2016 का लंबा शीर्षक कहता है कि “यह एक ऐसा अधिनियम है जो कि अच्छा प्रशासन, सक्षम, पारदर्शी और सब्सिडी, लाभ और सेवाओं की लक्षित डिलीवरी उपलब्ध कराने के लिए है जिसके लिए भारत सरकार के समेकित कोष से धन दिया जाता है …सिबल ने कहा, “यह स्पष्ट नहीं है कि सारा खर्च समेकित निधि देगा या वह इसका सिर्फ आंशिक हिस्सा ही देगा।”

सिबल ने कहा, “ऐसे बहुत हक़ हैं जो अनिवासी भारतीयों को भी दिए गए हैं। क्या राज्य उनको यह आधार नहीं होने पर देना बंद कर देगा? फिर, ऐसी कई हकदारी है जिन्हें अनिवार्य रूप से आधार से जोड़ दिया गया है जिनका कि उद्गम स्थल संविधान का पार्ट III है। इनको आधार के अभाव में रोकना मौलिक अधिकारों पर शिकंजा है। किसी को आजीविका के उसके अधिकार से इस तरह वंचित नहीं किया जा एकता। आधार परियोजना अनुच्छेद 14 और 21 पर खड़े नहीं उतरता।

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