दोषी व्यक्ति कैसे राजनीतिक पार्टी का मुखिया बन सकता है ? कैसे उम्मीदवार चुन सकता है ? SC ने केंद्र से पूछा

भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच ने एक दोषी करार व्यक्ति द्वारा राजनीतिक दलों का नेतृत्व करने और  पार्टी के लिए उम्मीदवारों चुनने पर बडे सवाल उठाए हैं।

सोमवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा, “एक दोषी व्यक्ति खुद चुनाव नहीं लड़ सकता तो एक राजनीतिक दल का पदाधिकारी कैसे बन सकता है और चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार कैसे चुन सकता है ?  यह हमारे फैसले के खिलाफ है कि राजनीति में भ्रष्टाचार को चुनाव की शुद्धता से बहिष्कृत किया जाना चाहिए। “

 उन्होंने आगे कहा, “यह एक अजीब स्थिति है, दोषी व्यक्ति अकेले कुछ नहीं कर सकते  लेकिन सामूहिक रूप से कुछ एजेंटों के माध्यम से कर सकते हैं?”

चीफ जस्टिस ने कहा, “कोई व्यक्ति सीधे चुनाव नहीं लड़ सकता, इसलिए वह एक राजनैतिक पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने के लिए व्यक्तियों का समूह बनाता हैं। लोकतांत्रिक गतिविधियों को करने के लिए लोगों की एक संस्था जैसे अस्पताल या स्कूल हैं, वो तो ठीक है लेकिन जब शासन के क्षेत्र में आता है, तो यह अलग है।”

वहीं इस मुद्दे पर  केंद्र ने अपना जवाब देने के लिए वक्त मांगा। सुप्रीम कोर्ट अब 26 मार्च को सुनवाई करेगा। दरअसल भाजपा नेता और एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय ने याचिका दाखिल कर चुनाव आयोग से राजनीति को दोषमुक्त करने और आंतरिक पार्टी लोकतंत्र को सुनिश्चित करने के लिए निर्देश मांगा है। साथ ही कहा है कि दोषी करार व्यक्तियों के पार्टी बनाने या पदाधिकारी बनने पर रोक होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही चुनाव आयोग और केंद्र को नोटिस जारी किए थे।

वहीं शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में  भारतीय चुनाव आयोग ने राजनीति से अपराधीकरण को हटाने का समर्थन किया है, लेकिन दोषी राजनेताओं को राजनीतिक दलों के गठन से वंचित करने के मुद्दे पर कोई तर्क देने से परहेज किया है।

अपने हलफनामे में चुनाव आयोग ने कहा है कि वह 1998 के बाद से राजनीति से अपराधीकरण को हटाने की मांग कर रहा है, जब उसने केंद्र सरकार को एक प्रस्ताव भेजा था। जुलाई, 2004 और दिसंबर, 2016 में प्रस्तावित चुनावी सुधारों की सिफारिशों को फिर से दोहराया गया है।

 इसके बाद यह प्रस्तुत किया गया, “उपरोक्त के मद्देनजर, यहां प्रस्तुत किया जाता है कि भारत के चुनाव आयोग ने राजनीति के वर्चस्व के लिए सक्रिय रूप से कदम उठाए हैं, और इस संबंध में सिफारिशें की हैं। हालांकि, राजनीति को प्रभावी ढंग से परिभाषित करने के लिए आगे विधायी संशोधन के कदमों की आवश्यकता होगी जो भारत के चुनाव आयोग के दायरे से परे है।

  चुनाव आयोग  ने राजनीतिक दलों के पंजीकरण को रद्द  करने की शक्ति मांगी है, प्रस्तुत करते हुए . “यहां स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है कि भारत के चुनाव आयोग को एक राजनीतिक दल  पंजीकरण और पंजीकरण के विनियमन, विशेषकर अपने संवैधानिक जनादेश को देखते हुए, को रद्द करने की शक्ति दी जानी चाहिए।

इसके लिए आवश्यक आदेश जारी करने के लिए अधिकृत होना चाहिए ।

 ” इसमें आगे यह बताया गया है कि जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1951 की धारा 29 ए राजनीतिक दलों को पंजीकृत करने या ना करने का फैसला करने की अनुमति  देता है। यह कहा गया है कि पार्टियों के पंजीकरण रद्द करने की शक्ति की बात सबसे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा जुलाई, 1 998 में कानून मंत्री को लिखे गए एक पत्र में

सुझाई गई थी। यह प्रस्ताव जुलाई, 2004 में दोहराया गया था। चुनाव आयोग ने इस बात पर जोर दिया कि उसे पार्टियों के पंजीकरण रद्द करने का अधिकार  आवश्यक चुनावी सुधार है।

इसके साथ ही कोर्ट को यह भी सूचित किया कि चुनाव आयोग ने 2016 में अपने स्वयं के समझौते के साथ, ऐसे पंजीकृत राजनीतिक दलों के मामलों की समीक्षा करने के लिए एक पहल की जिसने किसी भी आम चुनाव में किसी भी उम्मीदवार को नहीं उतारा।  सत्यापन में उसकी सूची से 255 राजनीतिक दलों के नामों को हटा दिया गया। इसके अलावा ये कहते हुए कि “हमारे जैसे किसी देश में आंतरिक पार्टी लोकतंत्र जरुरी है”,  यह भी कहा कि इस तरह के लोकतंत्र  चुनाव आयोग द्वारा सुनिश्चित नहीं किए जा सकते और इसके लिए विधायी संशोधन की आवश्यकता होगी।

Got Something To Say:

Your email address will not be published. Required fields are marked *


*