मणिपुर फर्जी मुठभेड़ में एफआईआर दायर करने में देरी पर सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट की फटकार

मणिपुर फर्जी मुठभेड़ में एफआईआर दायर करने में देरी पर सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट की फटकार

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश मदन बी लोकुर और यूयू ललित की विशेष पीठ ने मणिपुर में हुए फर्जी मुठभेड़ों में अब तक एफआईआर नहीं दायर कर पाने के कारण मंगलवार को सीबीआई को फटकार लगाई।

सुप्रीम कोर्ट ने 14 जुलाई 2017 को अपने फैसले में कहा था, “यह उचित होगा कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) इन फर्जी मुठभेड़ों और सुरक्षा बालों की ओर से बदले की कार्रवाई की जांच करे। इसके अनुरूप, सीबीआई के निदेशक को निर्देश दिया जाता है कि वह पांच अधिकारियों का एक समूह बनाए और तीन टेबल्स में जो रिकॉर्ड दिए गए हैं उनकी जांच करे और जरूरी प्राथमिकी दर्ज करे और 31 दिसंबर 2017 तक जांच पूरी कर ले और जहाँ भी जरूरी हो, चार्जशीट तैयार कर ले।

8 जनवरी को हुई सुनवाई में पीठ ने कहा, “31 दिसंबर 2017 तक मात्र 11 एफआईआर ही दर्ज किए गए थे और ऐसा लगता है कि अभी तक कोई चार्जशीट दाखिल नहीं किया गया है...हम लोगों को लगता है कि सीबीआई और विशेष जाँच दल मामले को उतनी गंभीरता से नहीं ले रही है जितनी गंभीरता की इसमें जरूरत है।”

इसे देखते हुए पीठ ने सीबीआई के उप महानिरीक्षक, अपराध शाखा, शरद अग्रवाल को मामले की अगली सुनवाई में इस मामले के बारे में प्रगति रिपोर्ट के साथ कोर्ट में उपस्थित रहने का निर्देश दिया था।

वरिष्ठ वकील कोलिन गोंजाल्वेस जो कि याचिकाकर्ताओं की पैरवी कर रहे हैं, ने कहा, “एफआईआर दायर करने में ...न तो स्थान की जांच होनी है और न ही कोई फोरेंसिक विश्लेषण की ही इसमें जरूरत है फिर भी अभी तक मात्र 12 एफआईआर ही दर्ज किए गए हैं।”

एएसजी मनिंदर सिंह ने कहा “सीबीआई को जो 48 मामले सौंपे गए थे उनमें से छह मामलों में विक्टिम के परिवार वालों ने अभी तक एजेंसी से संपर्क नहीं किया है और एक मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बंद कर दिया है।”

पीठ ने कहा, “तो आप जो मामले क्लोज कर दिए गए हैं उनमें क्लोजर रिपोर्ट दायर कीजिये। पर एफआईआर तो दर्ज किया ही जाना है।”

शरद अग्रवाल ने कहा, “उन्हें जो मामले सौंपे गए हैं उसके बारे में सीबीआई को जांच आयोग की बहुत ही भारी भरकम रिपोर्ट मिली है। एफआईआर दायर करने से पहले यह पता करने के लिए कि कोई अपराध हुआ है कि नहीं रिपोर्टों का विश्लेषण होना जरूरी है जिसमें ज्यादा समय लगता है।”

इस पर पीठ ने जवाब दिया, “यह आपकी चिंता नहीं होनी चाहिए। यह कोर्ट का काम है। आपको बहुत सारे मामले ऐसे दिए गए हैं जो कि गौहाटी हाई कोर्ट के फैसलों पर आधारित हैं। एफआईआर नहीं दायर करके आप कोर्ट की अवमानना कर रहे हैं।”

एएसजी के यह स्पष्ट करने के आग्रह पर कि क्या हाई कोर्ट, एनएचआरसी और जांच आयोग की रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर दायर किये जा सकते हैं, पीठ ने कहा, “कुछ भी स्पष्ट करने की जरूरत नहीं है। 14 जुलाई 2017 के फैसले के अनुसार सिर्फ वे मामले सीबीआई को दिए गए हैं जिसे हाई कोर्ट, एनएचआरसी या जांच आयोग ने पहले ही इसकी जांच कर ली है; इन मामलों को लेकर सारे प्रारम्भिक कार्य कर लिए गए हैं। सीबीआई से उम्मीद की जा रही थी कि वह यहाँ से आगे का काम अपने हाथ में लेगी...एफआईआर दायर किए जाने हैं, जांच की जानी है और उसके बाद सीआरपीसी की धारा 173 के अधीन रिपोर्ट दर्ज कराई जानी है।”

गोंजाल्वेस ने कहा, “जो 12 एफआईआर दर्ज किए गए हैं उसमें भी किसी भी विक्टिम के परिवार वाले से सीआरपीसी की धारा 161 के तहत अभी तक पूछ्ताछ नहीं की गई है।”

पीठ ने सीबीआई से कहा है कि वह 31 जनवरी तक एफआईआर दायर करने की प्रक्रिया पूरी कर ले।