मुल्लापेरियार बांध: SC ने किसी भी अप्रत्याशित आपदा से निपटने के लिए केंद्र को विशेष समिति बनाने को कहा

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने केंद्र सरकार को केरल के मुल्लापेरियार बांध से होने वाली किसी भी अप्रत्याशित आपदा से निपटने के लिए विशेष समिति के गठन का निर्देश दिया है।

बेंच ने बांध के मालिक तमिलनाडु राज्य और केरल, जहां बांध स्थित है, को भी निर्देश दिया है कि वो भी अपनी समितियां भी गठित करें और किसी भी आपदा के हालात में केंद्रीय समिति के साथ समन्वयता से काम करें। बेंच जिसमें जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड भी शामिल थे, ने आशा व्यक्त की कि तीनों सद्भावना से करेंगे। बेंच ने पांच जजों के संविधान पीठ के  2014 के फैसले को दोहराया कि  बांध की ऊँचाई बढ़ने के संबंध में आदेश सभी पर बाध्यकारी है।

सुप्रीम कोर्ट वकील रसेल जॉय द्वारा दायर की गई याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें बांध की सुरक्षा के मुद्दे को उठाया गया था। उन्होंने तमिलनाडु और केरल के बीच 1895 में निर्मित मुल्लापेरियार बांध के जीवन काल का अध्ययन करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय एजेंसी की नियुक्ति के लिए सरकार को निर्देश मांगा था।

बेंच ने अपने आदेश में कहा, “ मुल्लापेरियार बांध के निकट क्षेत्र में अप्रत्याशित आपदा से निपटने के लिए केन्द्र की एक अलग समिति होगी। केरल राज्य की राज्य योजना के तहत एक समिति होगी।”

इससे पहले AG के के वेणुगोपाल की सहायता मांगने वाली बेंच ने  11 जनवरी, 2018 को दिए गए पर्यवेक्षी समिति के अध्यक्ष गुलशन राज  के प्रमाणपत्र पर संज्ञान लिया था। ये प्रमाणपत्र AG ने दाखिल किया था।

बेंच को बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले के मुताबिक  बांध संबंधी मुद्दों पर नजर रखने के लिए एक पर्यवेक्षी समिति की स्थापना की गई थी। समिति  का काम बांधों  की सुरक्षा पर बारीकी से निगरानी रखना है।

सुप्रीम कोर्ट ने AG के उस जवाब के बाद 2016 की याचिका का निपटारा कर दिया था जिसमें  केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के वक्तव्य का हवाला दिया गया था कि केंद्र सरकार ने देश में सभी बाँधों की सुरक्षा को देखने और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 को लागू करने का फैसला किया है।

याचिकाकर्ता के वकील मनोज वी जॉर्ज ने तर्क दिया कि बांध के नीचे रहने वाले लोग लगातार डर में हैं क्योंकि बांध 122 साल पुराना है। विभिन्न अध्ययनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि एक बांध का जीवन काल, जो मानव निर्मित है, केवल 50 वर्ष है। सरकार ने स्वीकार किया है कि देश में 196 बांध 100 साल से अधिक पुराने हैं। बांध के पास रहने वाले लोग किसी भी पैदा होने वाली विपत्ति की सीधी रेखा में हैं।

याचिका के अनुसार  पेरियार नदी के पार बांध का कच्चे चूने “ सुरकी” मोर्टार से निर्माण किया गया था, वो भी उस समय जब बांध इंजीनियरिंग एक समग्र ग्रेविटी संरचना के रूप में अपनी प्रारंभिक अवस्था में था। यहां तक ​​कि इंजीनियरों और बांधों के बनाने वालों ने बांध के  50 साल के जीवनकाल पर विचार किया था। याचिका में कहा गया है कि यह एक उचित तथ्य है कि इस बांध का जीवनकाल निर्माणकर्ताओं की सोच के मूल रूप से दुगना हो गया है।

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