JGLS गैंगरेप केस : SC ने उठाया सवाल, ट्रायल के दौरान जेल में और सजा के बाद आ गए दोषी ?

जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल में सहयोगी छात्रा के साथ गैंगरेप के दोषी दो छात्रों की सजा निलंबन और जेल से बाहर आने पर सुप्रीम कोर्ट ने बडे सवाल उठाए है।

जस्टिस एस ए बोबडे और जस्टिस एल नागेश्वर राव की बेंच ने कहा कि कानून रोजाना नई सीख देता है। ये दुर्लभ मामला है जब ट्रायल चल रहा था तो दोनों जेल में थे और सजा होने के बाद वो जेल से बाहर आ गए। ये नहीं चल सकता। कोर्ट उन्हें फिर से जेल भेज देगा। हालांकि बेंच मे सात साल की सजायाफ्ता तीसरे दोषी विकास गर्ग के गैर जमानती वारंट पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट अब पूरे मामले की सुनवाई 18 जनवरी कोकरेगा।

दरअसल गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट दोषी विकास गर्ग की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कोर्ट में कहा कि वो गैंगरेप का दोषी नहीं है बल्कि उसे रेप केस में सात साल की सजा सुनाई गई थी। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के सजा के निलंबन करने पर वो जेल से बाहर आ गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के बाद उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किए गए हैं। उसका मामला दोनों छात्रों से अलग है इसलिए वारंट पर रोक लगाई जाए।

वहीं याचिकाकर्ता और राज्य की ओर से कहा गया कि तीनों छात्र फरार हैं और उन्होंने सरेंडर नहीं किया है।

6 नवंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि  ग्लोबल लॉ स्कूल के तीनों लॉ छात्र फिर से जेल जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एस ए बोबडे और जस्टिस मोहन एम शांतनागोदर की बेंच ने पीडिता की याचिका पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आरोपियों की सजा को निलंबित करने के फैसले पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार और तीनों छात्रों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा थी। हाईकोर्ट ने पीडिता पर कई आपत्तिजनक टिप्पणियां की की थीं।

पीडिता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा। इसी पर ये आदेश जारी किए गए।

गौरतलब है कि  पिछले साल सात सितंबर में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सोनीपत स्थित जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के तीन लॉ छात्रों की सजा निलंबित कर दिया था। उन्हें दो साल पहले यूनिवर्सिटी में ही पढने वाली छात्रा को ब्लैकमेल करने और गैंगरेप रेप करने के मामले में दोषी ठहराया गया था।

अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत ने मुख्य आरोपी हार्दिक सीकरी और उसके दोस्त करण छाबरा को 20 साल की सज़ा सुनाई थी जबकि विकास गर्ग को सात साल की सज़ा सुनाई गई थी। तीनों ने हाईकोर्ट से अपील लंबित होने की वजह से जमानत पर रिहा करने की मांग की थी। उनकी अर्जी को मंजूर करते हुए हाईकोर्ट ने उनकी सज़ा निलंबित कर दी ओर शर्त लगा दी कि इस दौरान तीनों देश छोडकर नहीं जाएंगे और अगर पढाई के लिए विदेश जाना हो तो कुछ शर्तों को पूरा करना होगा। छात्रा से किसी भी तरह संपर्क करने की कोशिश नहीं करेंगे और अपना दृश्यरतिक प्रवृतियों के बने रहने तक मनोचिकित्सक से काउंसलिंग कराएंगे। तीनों के अभिभावकों को निर्देश दिया गया था कि इस मुद्दे पर वो छह महीने बाद कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल करेंगे।

जस्टिस महेश ग्रोवर और जस्टिस राज शेखर अत्री ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि वो पीडिता की चिंता, समाज की मांग और कानून और सुधारात्मक एवं पुनर्वास न्याय के बीच बैलेंस बनाना चाहते हैं। ये एक मजाक होगा कि युवा मन को लंबे वक्त तक जेल में कैद रखा जाए जो उन्हें शिक्षा, खुद के मुक्त होने के मौके और सामान्य तरीके से समाज हिस्सा बनने से वंचित करेगा।

बेंच ने कहा कि लंबे वक्त तक कैद में रखना उनके लिए अपूर्णीय क्षति हो सकती है क्योंकि अपील कुछ समय तक लंबित रहेगी। हमारी राय में जब तक ये अपील लंबित रहेगी, दूसरे अपराध की संभावना में उनके मन में डर रहेगा कि अगर अपील फेल हो गई तो उन्हें लंबी कैद होगी।

इतना ही नहीं बेंच ने  ये तक कहा था कि ये पीडित का हिंसा के प्रति ‘ कैजुअल’ व्यवहार है जो सजा निलंबन के बाध्यकारी कारण हैं। पीडिता के बयानों में कहीं भी  यौन अपराधों में परिचितों के साथ सामान्य व्यवहार, दुस्साहस और प्रयोग कोई अन्य पहलू नहीं आया और इसी कारण ये तथ्य सजा को निलंबित करने के बाध्यकारी कारण हैं वो भी तब आरोपी युवा हैं और पीडिता ने हिंसा के प्रति अप्रिय व्यवहार नहीं दिखाया और वो सामान्य तरीके से घटनाओं के साथ चलती रही।

बेंच ने ये भी कहा था कि ये घटना युवा मन की ड्रग्स, शराब और सामान्य यौन दुस्साहस के खतरनाक सोच की प्रतिबिंब है और ये एक भ्रमित व दृश्यरतिक दुनिया है।

आदेश में पीडिता के बयानों के आधार पर कहा गया था कि युवाओं की अपरिपक्व लेकिन नापाक दुनिया में जाने और झांकने की जरूरत है जहां युवाओं को सम्मान और आपसी समझ पर आधारित रिश्तें की कीमत का अहसास नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि पीडिता के बयानों पर गहन विचार करने पर पता चलता है कि ये विकृत विचार हैं और ये भ्रमित व्यवहार व दृश्यरतिक दिमाग के वैकल्पिक निष्कर्ष की ओर इशारा करता है।

इस दौरान सजा को निलंबित करते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि ट्रायल कोर्ट ने अंतरिम राहत के तौर पर पीडिता को मुआवजा नहीं दिया। कोर्ट ने तीनों को पीडिता को दस लाख रुपये मुआवजा देने के आदेश दिए।

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