अचल संपत्ति को बांटने के लिए मुस्लिम पिता अपनी अवयस्क बेटी का कानूनी अभिभावक हो सकता है : केरल हाई कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

इस्लामी क़ानून का हवाला देते हुए केरल हाई कोर्ट ने कहा है कि मुस्लिम पिता अचल संपत्ति को बांटने के लिए अपनी अवयस्क बेटी का कानूनी अभिभावक बन सकता है। कोर्ट ने एक मुस्लिम बेटी की उस याचिका को ख़ारिज करते हुए यह फैसला दिया जिसने अपने पिता द्वारा संपत्ति के बंटवारे को नहीं मानते हुए संपत्ति का दुबारा बँटवारा कराए जाने की मांग की थी।

यह विवादित संपत्ति शुरू में बेटी की कानूनी अभिभावक के रूप में पिता ने बेटी और उसके भाई बहनों के लिए खरीदी थी। बाद में पिता ने बेटी के कानूनी अभिभावक के रूप में इस जमीन को उसके और उसके भाई में बांट दिया।

बेटी ने अदालत में संपत्ति के दुबारा बंटवारे के लिए याचिका दायर कर दी। उसने कोर्ट से मांग की कि उसके पिता ने उसकी ओर से जो बँटवारा किया वह उसे मान्य नहीं है। यह मामला संपत्ति के बंटवारे के 28 साल बाद दायर किया गया जब वह लड़की वयस्क हो चुकी थी।

न्यायमूर्ति वी चितम्बरेश और न्यायमूर्ति सतीश निनान ने इस्लामी क़ानून का व्यापक संदर्भ दिया जिसे एम हिदायतुल्लाह और अरशद हिदायतुल्लाह ने संहिताबद्ध किया है। यह कहा गया कि इस्लामी क़ानून की धारा 359 के अनुसार निम्न व्यक्ति अवयस्कों की सम्पतियों के अभिभावक हो सकते हैं :

  1. पिता;
  2. पिता की वसीयत के अनुसार नियुक्त प्रबंधक;
  3.  पिता का पिता;
  4. पिता के पिता की वसीयत के अनुरूप नियुक्त प्रबंधक।

कोर्ट ने कहा कि इसे देखते हुए पिता का इस्लामिक क़ानून की धारा 359 के तहत अपनी अवयस्क बेटी का कानूनी अभिभावक बनना कानूनन सही है। यह भी कहा गया कि किसी अवयस्क की संपत्ति के कानूनी अभिभावक को अवयस्क की अचल संपत्ति को बेचने का अधिकार नहीं है। इस्लामी क़ानून की धारा 362 के तहत वह ऐसा तभी कर सकता है जब –

  1. उसे दोगुना कीमत मिल रही हो;
  2. अवयस्क के पास और कोई संपत्ति नहीं हो और उसके गुजारे के लिए इसको बेचना जरूरी हो;
  3.   मृतक इतना कर्ज छोड़कर गया हो कि उसको चुकाने का कोई और रास्ता नहीं हो;
  4. संयुक्त कर्जा हो और इसे चुकाने का कोई और जरिया न हो;
  5. संपत्ति से होने वाली आय खर्च से कम हो;
  6. संपत्ति बर्बाद हो रही हो; और
  7.  संपत्ति जब्त कर ली गई हो और अभिभावक को पूरा विश्वास है कि यह वापस नहीं मिल सकती।

कोर्ट ने कहा कि उपरोक्त कोई भी आकस्मिक मुद्दा इस मामले में लागू नहीं होता इसलिए बँटवारे को इन हालातों में गैरकानूनी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि लिमिटेशन क़ानून के अनुच्छेद 60 के अनुसार, बंटवारे को गैरकानूनी साबित करने के लिए मामला बेटी के वयस्क बनने के तीन साल के भीतर दायर किया जाना चाहिए था। पर ऐसा नहीं किया गया और इसलिए कोर्ट इस याचिका को खारिज करने के लायक समझता है।

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