सेक्यूलरिज्म पंथनिरपेक्षता मात्र नहीं है – न्यायमूर्ति केटी थॉमस

“सेक्यूलरिज्म” का अनुवाद अमूमन “पंथनिरपेक्षता” (धर्म से अलग) किया जाता है। पर यह सेक्यूलरिज्म का बहुत ही संकीर्ण अर्थ हमें देता है। इसीलिए लोगों ने इस शब्द के इसी संकीर्ण अर्थ को अभी तक समझा है। निस्संदेह, जैसा कि मैंने समझा है, सेक्यूलरिज्म का एक अर्थ धर्म से अलग होना भी है। पर सेक्यूलरिज्म की संकल्पना धर्म के बारे में उसके अर्थों से कहीं ज्यादा व्यापक और मूल्यवान है। यह समझना गलत है कि सेक्यूलरिज्म का उद्देश्य धार्मिक कर्मकांडों से मुक्ति सुनिश्चित करता है। सेक्यूलरिज्म की मौलिकता धार्मिक प्रभावों सहित सभी तरह की फिरकापरस्ती को नकारता है और वह व्यक्ति की गरिमा को ही मौलिक मानता है। चूंकि स्थानीय भाषा में सेक्यूलरिज्म का समतुल्य शब्द नहीं मिलता है इसलिए मैं समझता हूँ कि जब भी जरूरत होगी मैं इस आलेख में संबंधित संदर्भ में इसी शब्द का प्रयोग करूंगा।

सेक्यूलरिज्म  के धर्म के साथ जुड़ने का एक कारण इसकी एक अजीबोगरीब अमरीकी पृष्ठभूमि है। इसाई धर्मप्रचारकों की शिक्षा और उनकी गतिविधयाँ सरकार के निर्णयों और निर्देशों के उद्देश्यों को समझने में आड़े आई होगी। इसी पृष्ठभूमि में, अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में सेक्यूलरिज्म को समझाने वाले एक अनुपात को धर्म से अलग होना समझ लिया गया। रेयनॉल्ड्स बनाम यूएसए (1878) मामले के फैसले ने स्पष्ट कर दिया कि अमरीका की संघीय सरकार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से धार्मिक गतिविधियों में मदद नहीं करेगी। अनुपात इस संदर्भ के लिए प्रासंगिक होगा। अंततः, इसके बाद अन्य न्यायालयों ने जो फैसले दिए वो भी इस फैसले का समर्थन करते थे।  लेकिन सेक्यूलरिज्म के संकीर्ण अर्थ का दूसरा कारण रहा है धर्म-आधारित शासन और दूसरे गणराज्यों के बीच अंतर का प्रभाव जिसके तहत गणराज्यों को सेक्यूलर राष्ट्र माना गया। मैं यहाँ यह कहना चाहता हूँ कि सेक्यूलरिज्म सिर्फ धर्म-आधारित शासन को नकारना भर नहीं है।

भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने बार-बार कहा है कि सेक्यूलरिज्म भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताओं में से एक है। भारत के संवैधानिक इतिहास का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण फैसला आया केशवानंद भारती बनाम भारत सरकार के मामले में। इस मामले की सुनवाई देश में अबतक की सबसे बड़ी संवैधानिक पीठ ने की जिसमें 13 सदस्य थे और इसकी सुनवाई सर्वाधिक लंबे समय तक चली। और फिर जब इसका फैसला 1974 में आया तो वह भी देश के इतिहास का सबसे लंबा फैसला था। यद्यपि इस पीठ के अधिकाँश जजों ने अलग-अलग फैसले लिखे, पर सभी जज एकमत थे कि सेक्यूलरिज्म भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताओं में एक है। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जब संविधान बना तो उस समय कहीं भी उसमें सेक्यूलरिज्म शब्द का जिक्र नहीं था। संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने सेक्यूलरिज्म शब्द को संविधान की प्रस्तावना में शामिल किए जाने की मांग की। पर डॉ. बीआर आंबेडकर जो इस सभा के सभापति थे, इसके पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था कि किसी भी देश का संविधान एक पवित्र दस्तावेज है और जहाँ तक संभव हो सके इसमें किसी पारिभाषिक शब्दों की भाषणबाजी से बचना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों के माध्यम से सेक्यूलरिज्म प्रदर्शित होगा न कि प्रस्तावना में इसे शामिल कर देने भर से। लेकिन 1977 में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी संविधान में “प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य” शब्दों को संविधान की प्रस्तावना में जुड़वाने में सफल रहीं। ऐसा देश में विवादास्पद आपातकाल लगाए जाने की पृष्ठभूमि में हुआ जब देश के नागरिकों के अनेक मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया और देश के धर्मनिरपेक्ष साख को धक्का पहुंचा। चूंकि किसी भी व्यक्ति को इस तरह के खोखले शब्दों को शामिल किए जाने का विरोध करने की स्वतंत्रता नहीं थी और इसका विरोध कर सकनेवाले सभी लोगों को जेल में बंदी बना दिया गया था, इसलिए प्रधानमंत्री को इस संविधान संशोधन को पास कराने और इन शब्दों को संविधान की प्रस्तावना में शामिल कराने में कोई दिक्कत नहीं हुई। लेकिन जब आपातकाल समाप्त हुआ और लोगों को उनकी स्वतंत्रता वापस मिली, आपातकाल के समय किए गए कई संविधान संशोधनों को पुनर्संशोधन द्वारा समाप्त कर दिया गया। लेकिन प्रस्तावना में किए गए संशोधन को समाप्त नहीं किया गया क्योंकि सत्ताधारी नए नेताओं ने इन शब्दों को निष्प्रभावी माना और कहा कि अगर ये शब्द प्रस्तावना में रहते भी हैं तो इससे देश की जनता को कोई नुकसान नहीं होने वाला है।

सेक्यूलरिज्म  के बारे में जो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात संविधान में कही गई है वह यह है कि किसी व्यक्ति की मर्यादा सर्वोपरि है। सेक्यूलरिज्म का मुख्य आधार यह है कि किसी व्यक्ति की मर्यादा को ध्यान बंटानेवाले विभिन्न कारकों से बचाकर रखा जाए। संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत देश के सभी नागरिकों को क़ानून के तहत समानता का अधिकार और क़ानून द्वारा समान संरक्षण मिला हुआ है। यह मुख्यतः सेक्यूलरिज्म की ओर इंगित करता है। अनुच्छेद 15 के तहत धर्म, जाति, रंगभेद, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव की अनुमति नहीं है। अनुच्छेद 16 यह कहता है कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी पद पर नियुक्ति का अधिकार है। ये सभी अधिकार धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों से अनुप्रेरित हैं। इसी तरह अनुच्छेद 21 सभी नागरिकों को क़ानून के तहत उनके जीवन और उनकी स्वतंत्रता की रक्षा की गारंटी देता है।  धार्मिक स्वतंत्रता में किसी भी धर्म को नहीं मानने की स्वतंत्रता भी शामिल है। इसी तरह, किसी धर्म को स्वीकार करना, मानना और उसका प्रचार करना धार्मिक स्वतंत्रता के तहत आता है और यह सार्वजनिक नैतिकता, सार्वजनिक भलाई, सार्वजनिक व्यवस्था एवं अन्य मौलिक अधिकारों से बंधा है। यह इस बात को दर्शाता है कि संविधान निर्माताओं के मन में यह बात थी कि धार्मिक स्वतंत्रता उन चार विषयों से बंधा है। इसी तरह आम लोगों से प्राप्त राशि का प्रयोग किसी भी धर्म को बढ़ावा देने के लिए नहीं हो सकेगा और यह भी कि किसी भी सरकारी शिक्षा संस्थान या सरकार द्वारा वित्तीय मदद पाने वाले शिक्षा संस्थान में कोई धार्मिक निर्देश नहीं दिए जाएंगे। हालांकि, अनुच्छेद 29 का शीर्षक है “अल्पसंख्यक अधिकारों के हितों की रक्षा” और यह विशेष रूप से कहता है कि नागरिकों का कोई भी वर्ग जिसकी अपनी विशेष भाषा है, अपनी लिपि या संस्कृति है, उसे इनकी सुरक्षा का अधिकार होगा और सरकारी संस्थानों या सरकारी सहायता-प्राप्त संस्थानों में धर्म, जाति या अन्य संबंधित आधारों पर प्रवेश नहीं देने पर प्रतिबंध है। ये सारे प्रावधान संविधान के सेक्यूलर साख के प्रमाण हैं। अनुच्छेद 30 में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की चर्चा की गई है जिसमें धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक शामिल हैं और इन्हें शिक्षा संस्थानों की स्थापना करने और उसको चलाने का अधिकार मिला हुआ है। सौभाग्य से टीएमए पाई मामले में 11 सदस्यीय पीठ ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि कोई भी अल्पसंख्यक उससे ज्यादा अधिकारों का दावा नहीं कर सकता जितना बहुसंख्यकों को मिला हुआ है। पीठ ने आगे स्पष्ट किया कि अनुच्छेद में शिक्षा संस्थानों से संबंधित अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा की बात कही गई है और किसी तरह के ज्यादा ऊंचे अधिकारों की नहीं।

संविधान का अनुच्छेद 44 एक आम नागरिक संहिता की बात करता है और 51A नागरिकों के कर्तव्यों की चर्चा करता है। सबसे बड़ी बात यह है कि संविधान मौलिक कर्तव्यों के द्वारा देश के नागरिकों में वैज्ञानिक स्वभाव, मानवीयता, जांचने और सुधार करने की भावना विकसित करने की बात करता है। ये सभी भारतीय संविधान के सेक्यूलर चरित्र को दर्शाता है।

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सेक्यूलरिज्म के अनन्य समर्थक थे। वर्ष 1952 में उनको इसाई युवाओं के विश्व सम्मलेन के उद्घाटन के लिए बुलाया गया पर उन्होंने इसमें यह कहते हुए शामिल होने से मना कर दिया कि संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति को आधिकारिक रूप से किसी भी तरह के धार्मिक जलसों में शामिल होने से बचना चाहिए। यह कहा जाता है कि जवाहरलाल नेहरू ने जिस परंपरा की नींव डाली उसका बाद के कई नेताओं ने पालन नहीं किया। मेरा मानना है कि धार्मिक यात्राओं पर जाने वाले लोगों के खर्च में सब्सिडी देना भी संविधान में सेक्यूलरिज्म के सिद्धांतों से मेल नहीं खाता है। सरकार ज्यादा से ज्यादा यह कर सकती है कि उन्हें परिवहन सुविधा, पुलिस सुरक्षा और इसी तरह की अन्य सुविधाएं उपलब्ध करा सकती है ताकि उनकी यात्रा में कोई बाधा न आए।

 मैं यहाँ देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन का एक बयान उद्धृत करना चाहता हूँ जो एक महान चिंतक एवं शिक्षाशास्त्री होने के साथ-साथ एक धार्मिक व्यक्ति भी थे। जब वे राष्ट्रपति निर्वाचित हुए, एक प्रमुख पत्रकार टीवीआर शेनॉय ने उनका साक्षात्कार लिया और कहा कि उनका राष्ट्रपति बनना देश के सेक्यूलरिज्म की जीत है। डॉ. जाकिर हुसैन ने उनसे पूछा कि उन्होंने यह क्यों कहा? शेनॉय ने जवाब दिया कि किसी मुसलमान का भारतीय गणराज्य के सर्वोच्च पद पर पहुंचना यह साबित करता है कि इस गणराज्य का चरित्र सेक्यूलर है। पर राष्ट्रपति ने उनकी और देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “भारत में सेक्यूलरिज्म का लक्ष्य पूरी तरह से तभी प्राप्त होगा जब आपको यह न पता चले कि मेरा धर्म क्या है।” मैंने शेनॉय के एक आलेख में उनका यह साक्षात्कार पढ़ा। यह बात मेरे मन में आज भी उसी तरह ताजा है। इस महान राष्ट्रपति ने क्या कहा उसको मैं यहाँ पुनर्व्यवस्थित करके लिखना चाहता हूँ : मेरा धर्म, मेरी भाषा आदि, मेरी निजी संपत्ति हैं। मेरे कर्तव्यों के निर्वहन पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।”

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