वकीलों को वरिष्ठता का दर्जा देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने उठाया बडा कदम, चीफ जस्टिस की कमेटी बनाई [निर्णय पढ़ें]

हाईकोर्ट व सुप्रीम में जजों की नियुक्ति को लेकर कॉलिजियम में पारदर्शिता को लेकर बडा कदम उठाने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता बनाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और संपूर्ण प्रणाली में बदलाव कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसले में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट और सभी हाईकोर्ट में  वरिष्ठ वकील का दर्जा कमेटी फॉर डेजिनेशन ऑफ सीनियर्स देगी जिसकी अगवाई चीफ जस्टिस करेंगे। साथ ही इसके लिए बकायदा सचिवालय भी होगा। जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच ने इंदिरा जयसिंह की याचिका पर ये फैसला सुनाया है।

इस फैसले में कहा गया है कि इस कमेटी में पांच लोग होंगे। सुप्रीम कोर्ट में  किसी वकील को वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा देने के लिए  उस कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इस कमिटी की अध्यक्षता करेंगे।इसमें दो वरिष्ठ  जज और अटॉर्नी जनरल रहेंगे। ये चारों मिलकर बार एसोसिएशन की तरफ से किसी को मनोनीत करेंगे।

जबकि हाईकोर्ट की कमिटी में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश, दो वरिष्ठ  जज एडवोकेट जनरल होंगे। ये चारों मिलकर हाईकोर्ट एसोसिएशन की ओर से एक सदस्य को मनोनीत करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि इसके लिए बकायदा सचिवालय होगा जो वकीलों की जानकारी कमेटी के साथ साझा करेगा। वो सभी उम्मीदवारों के नाम, उनके जजमेंट, कार्यकाल, पर्सनलटी संबंधी सारी जानकारी वेबसाइट पर अपलोड कर सुझाव मांगेगी।इसमें सभी सदस्यों के विचारों को भी शामिल किया जाएगा।  इसके बाद ये सारा रिकार्ड फुल कोर्ट को भेजा जाएगा जिस पर वो सीक्रेट बैलेट या बहुमत के आधार पर विचार करेगी। जिन केसों को पहले राउंड में शामिल नहीं किया जाएगा वो दो साल बाद ही फिर आवेदन कर पाएंगे।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर अधिवक्ता कानून की धारा 16 और 23 (5) की संवैधानिकता को चुनौती दी गयी है। इसमें वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता बनाने के विधायी आधार का प्रावधान है। याचिकाकर्ता इंदिरा जयसिंह ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि वकीलों को सीनियर​ का दर्जा दिया जाते समय भेदभाव किया जाता है। याचिका में कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट संविधान की धारा 14 और 15 का उल्लंघन कर रहा है।

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