सुप्रीम कोर्ट ने निहित अधिकार के तहत 17 साल से अलग रह रहे जज दंपति का तलाक मंजूर किया [निर्णय पढ़ें]

पूरा न्याय देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अपने निहित अधिकार का इस्तेमाल करते हुए पश्चिम बंगाल के एक जिला जज को पत्नी से तलाक को मंजूरी दे दी है। जिला जज की पत्नी भी जिला जज हैं और दोनों 17 सालों से अलग रह रहे हैं।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में आए इस मामले में पति- पत्नी दोनों पश्चिम बंगाल में जिला जज हैं। कोर्ट ने पति की तलाक की अर्जी को ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि वो ये साबित नहीं कर पाए कि पत्नी ने उनके साथ क्रूरता की है। हाईकोर्ट ने भी अपील को खारिज कर दिया कि शादी के दोबारा शुरु ना होने की आशंका तलाक का कारण नहीं हो सकती।

पत्नी निचली अदालत में लिखित जवाब दाखिल करने के बाद कोर्ट में पेश नहीं हुईं। ना ही वो कभी हाईकोर्ट आई और ना सुप्रीम कोर्ट में। समर घोष बनाम जया घोष केस को रैफर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये व्यवहार साबित करता है कि पत्नी की पति के साथ रहने की इच्छा नहीं है। ऐसे में पति को मृत शादी में रखने को विवश करना और तलाक प्रक्रिया में शामिल होने से इंकार करना अपने आप में ही मानसिक क्रूरता है।

बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता और प्रतिवादी के फिर से एक साथ रहने की कोई गुंजाइश नहीं बची है और सभी उद्देश्यों के लिए ये शादी फिर से शुरु ना होने की हद तक टूट चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 142 में निहित अपने अधिकार के तहत तलाक का आदेश दे सकता है जब उसे ये लगे कि ये शादी काम करने लायक नहीं रही, भावनात्म रूप से मृत और फिर से शुरु ना होने की हद तक टूट चुकी है। ऐसे में जरूरत नहीं कि तलाक के लिए मौजूदा कानून के तहत पर्याप्त आधार होने ही चाहिए।

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