मुआवजे को लेकर संतुष्ट होने पर कोर्ट शिकायतकर्ता की सहमति के बिना भी बंद कर कर सकता है चेक बाउंस केस : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट के सेक्शन 138 के तहत किसी आरोपी को आरोप मुक्त किया जा सकता है भले ही शिकायतकर्ता की सहमति ना हो लेकिन कोर्ट इस पर संतुष्ट हो जाए कि शिकायतकर्ता की उचित भारपाई कर दी गई है।

कोर्ट ने ये भी कहा कि किसी अपराध में शिकायतकर्ता/ पीडित की सहमति का सामान्य कानून NI एक्ट के सेक्शन 138 में लागू नहीं होता। इसका कारण ये है कि सेक्शन 138 के तहत अपराध सिविल गलती है। इसलिए मजिस्ट्रेट को आपराधिक प्रक्रिया संहिता के सेक्शन 258 के तहत ट्रायल को रोकने और आरोपी को आरोपमुक्त करने का अधिकार है चाहे Cr.P.C. के अध्याय XXI के तहत संक्षिप्त ट्रायल चल रहा हो।

दरअसल जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस उदय उमेश ललित की बेंच एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें अपराध पर समझौता करने या विकल्प के तौर पर निजी पेशी से छूट की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वाला इस केस का आरोपी था। जबकि वो इस मामले में ब्याज व खर्च के साथ चेक की राशि समझौते के तौर पर चुकाने को तैयार था लेकिन शिकायतकर्ता ने सहमति नहीं दी जिसके बाद मजिस्ट्रेट ने निजी पेशी में छूट दिए बिना केस को जारी रखा। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जेआईके इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम अमरलाल वी जुमानी (2012) 3 SCC 255 को आधार बनाते हुए मामले में दखल देने से इंकार कर दिया जिसमें कहा गया था कि NI एक्ट के सेक्शन 138 में समझौता करने के लिए शिकायतकर्ता की सहमति होना जरूरी है।

जब ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, कोर्ट ने सेक्शन 138 के सिद्धांतों पर फिर से गौर किया और वरिष्ठ वकील केवी विश्वनाथन और वकील ऋषि मल्होत्रा को इस मामले में गाइडलाइन बनाने के लिए कोर्ट की मदद के लिए एमिक्स क्यूरी नियुक्त किया। कोर्ट ने ये भी गौर किया कि कुल आपराधिक केसों में कोर्ट में लंबित मामलों में 20 फीसदी केस सेक्शन 138 के हैं जिन्होंने पूरी प्रणाली को जाम कर दिया है। इसलिए ऐसे मामलों में पक्षकारों को समझौते के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

NI एक्ट के प्रावधान का उद्देश्य चेक के पैसे के भुगतान को सुनिश्चित करना है और शिकायकर्ता को मुआवजा दिलाना है। अन्य आपराधिक केसों की तरह इसमें आरोपी को सजा देना प्रमुख नहीं है।

सेक्शन 138के तहत केसों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित गाइडलाइन जारी की है।

  1. सेक्शन 138 के तहत अपराध सिविल गलती है।साबित करने का भार सेक्शन 139 के तहत आरोपी पर है लेकिन ऐसे सबूतों का मानक संभावनाओं की प्रधानता होनी चाहिए। Cr.P.C. के संक्षिप्त ट्रायल के प्रावधान के तहत ऐसे मामलों में सामान्यत: संक्षिप्त ट्रायल होता है लेकिन इस छूट के साथ कि एक्ट के अध्याय XXI मे। भी उचित हो। इसलिए Cr.P.C के सेक्शन 258 के तहत कोर्ट ऐसे मामलों को बंद कर सकता है अगर वो संतुष्ट हो जाए कि खर्च और ब्याज के साथ चेक की राशि शिकायतकर्ता को दी जा चुकी है और आरोपी को सजा देना का कोई कारण नहीं है। 
  2. इस प्रावधान का उद्देश्य मुख्य तौर पर मुआवजा दिलाना है, सजा देने का उद्देश्य भी भारपाई कराने के लिए दबाव बनाना है। शुरुआत में ही समझौते को बढावा दिया जाना चाहिए लेकिन बाद में भी इसे रोका नहीं जाना चाहिए अगर कोर्ट या पक्षकारों को उचित मुआवजा मिला हो।
  3. हालांकि समझौते के लिए दोनों पक्षकारों की सहमति जरूरी है, यहां तक कि सहमति के अभाव में कोर्ट न्याय के हित में संतुष्ट होने पर कि शिकायतकर्ता को उचित मुआवजा मिल गया है, अपने अधिकार का इस्तेमाल कर कार्रवाई को बंद कर सकता है और आरोपी को आरोपमुक्त कर सकता है।
  4. एक्ट के अध्याय XVII के तहत केसों के ट्रायल सामान्यता संक्षिप्त होते हैं। सेक्शन 143 के दूसरे प्रावधान के तहत मजिस्ट्रेट को ये अधिकार है कि वो ये कहे कि संक्षिप्त ट्रायल अवांछनीय है क्योंकि इसमें एक साल से ज्यादा सजा दी जा सकती है। इसके साथ ही कोर्ट कोCr.P.C के सेक्शन 357 (3) के तहत ये अधिकार है कि वो IPC 64 के अंतर्गत सजा के साथ मुआवजा दिलाने औरCr.P.C के सेक्शन के तहत वसूली कर सके। इस विचार में सभी केसों में एक साल से ज्यादा की सजा की आवश्यकता नहीं है।
  5. चूंकि शिकायत के सबूत हलफनामे के जरिए दिए जाते हैं, कोर्ट हलफनामा देने वाले व्यक्ति को समन करके छानबीन करता है और प्रथम दृष्टया चेक बाउंस होने का सबूत बैंक स्लिप होता है, इसलिए मजिस्ट्रेट के लिए किसी अन्य प्रारंभिक सबूत की छानबीन की आवश्यकता नहीं है। ऐसे हलफनामे को सबूत के तौर पर ट्रायल के हर चरण और अन्य कार्रवाई में माना जाना चाहिए। हलफनामा दाखिल करने वाले व्यक्ति की छानबीन Cr.P.C केसेक्शन 264 के तहत हो। योजना है कि संक्षिप्त प्रक्रिया अपनाई जाए लेकिन अगरसेक्शन 143 के दूसरे प्रावधान के तहत   एक साल की सजा दी जा सकती है और इसके साथ ही Cr.P.C के सेक्शन 357 (3) के तहत मुआवजा चेक की राशि को देखते हुए अपर्याप्त माना जाए, आरोपी की वित्तीय स्थिति या व्यवहार या अन्य कोई हालात हो तो इसमें छूट दी जा सकती है।

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