सुप्रीम कोर्ट का एेहतिहासिक फैसला, 1400 साल पुराना तीन तलाक अंसवैधानिक करार [निर्णय पढ़ें]

 सुप्रीम कोर्ट ने एक एेहतिहासिक फैसले में मुस्लिम समुदाय में 1400 सालों से चल रहे तीन तलाक(तलाक-ए-बिद्दत) के प्रचलन को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि तीन तलाक, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

पांच जजों की संविधान पीठ ने बहुमत (3:2) के आधार पर दिए गए इस फैसले में कहा है कि तीन तलाक साफ तौर पर मनमाना है क्योंकि इसके तहत मुस्लिम पुरुष वैवाहिक संबंधों को खत्म करने की इजाजत देता है वह भी संबंध को बचाने का प्रयास करने के बगैर।  लिहाजा संविधान के अनुच्छेद-25 यानी धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत इस प्रथा पको संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

गौरतलब है कि पांच जजों के संविधान पीठ के सदस्य अलग-अलग धर्म के हैं।

जस्टिस कूरियन जोसफ, जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन और जस्टिस यूयू ललित ने जहां तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया है। वहीं चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस एस अब्दुल नजीर ट्रिपल तलाक को अनुच्छेद-25का अहम हिस्सा बताया है। इनका कहना है कि 1400 वर्षों से चली आ रही प्रथा अब धर्म का हिस्सा बन गई है।

जस्टिस कूरियन जोसफ ने अपने फैसले में कहा है कि तीन तलाक इस्लाम धर्म का मूल तत्व नहीं है। यह कुरान का हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा है ‘कुरान में जिस पर पाबंदी है, शर्रियत में उसे अच्छा नहीं कहा जा सकता। धर्मशास्त्र में जो जिस पर पाबंदी है और कानून की नजर में वह अच्छा नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि तीन तलाक शर्रियत के भी खिलाफ है।

चीफ जस्टिस जेएस खेहर के नजरिए से उलट जस्टिस जोसफ ने कहा कि महज इसलिए कि कोई प्रथा 1400 वर्षों से चली आ रही है उसे अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
वहीं जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन और जस्टिस यूयू ललित ने अपने फैसले में कहा है कि अगर मुस्लिम महिलाएं न्याय केलिए अदालत के पास आए तो कोर्ट हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती। उन्होंने कहा कि पति-पत्नी के संबंधों को सुधारने का प्रयास किए बिना एक झटके में तीन तलाक बोलकर वैवाहिक संबंध को तोडऩा भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 यानी समानता के अधिकार का उल्लंघन है। वैवाहिक संबंध के टूटने से पहले दोनों परिवारों के बीच मध्यस्थता का प्रयास जरूरी है।

वहीं चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस एस अब्दुल नजीर ने अपने फैसले में कहा है कि ट्रिपल तलाक को संविधान केअनुच्छेद-25 का हिस्सा बताया। साथ ही कहा कि यह अनुच्छेद-14, 19 और 21 का उल्लंघन नहीं करता. हालांकि इन्होंने इस मसले को विधायिका के पाले में डाल दिया और कहा कि सरकार 6 महीने में इसे लेकर कानून बनाए तब तक तीन तलाक पर रोक रहेगी।

संविधान पीठ ने यह ऐतिहासिक फैसला शायरा बानो, इशरत जहां सहित पांच मुस्लिम महिलाओं द्वारा दायर याचिका पर दिया है। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला आदि को जनहित याचिका में तब्दील कर दिया था।

 

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