सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर के लोगों को स्पेशल स्टेटस का दर्जा देने वाले मामले को बड़ी बेंच के सामने भेजा

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर के लोगों को स्पेशल स्टेटस का दर्जा देने वाले मामले को बड़ी बेंच के सामने भेजा


केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह जम्मू कश्मीर के लोगों को स्पेशल दर्जा देने से संबंधित मामले में कोई हलफनामा दायर नहीं करने जा रहे हैं। इस स्पेशल स्टेटस के तहत जम्मू कश्मीर में बाहर के लोग प्रॉपर्टी नहीं खरीद सकते और न ही वहां वोटिंग राइट का इस्तेमाल कर सकते हैं।


अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अगुवाई वाली बेंच को कहा कि इस मामले में केंद्र सरकार एफिडेविट दाखिल नहीं करेगी क्योंकि ये मामला संवैधानिक सवालों का है और ऐसे में मामले को लार्जर बेंच को भेजा जाना चाहिए। चीफ जस्टिस ने मामले को लार्जर बेंच रेफर करते हुए छह हफ्ते बाद सुनवाई के लिए तय किया है।

इस मामले में दो साल पहले याचिका दायर की गई थी लेकिन केंद्र ने जवाब दाखिल नहीं किया। सीनियर एडवोकेट केएन भट्ट और एडवोकेट बरुण कुमार सिन्हा ने कोर्ट कोबताया कि मामले संविधान के अनुच्छेद-35 ए और अनु्च्छेद 370 (1)(डी) से जुड़ा हुआ है। और ऐसे में मामले में अर्जेंट सुनवाई की दरकार है।

इससे पहले राज्य सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि सुप्रीम कोर्ट 1954 के राष्ट्रपति के ऑर्डर को डील कर चुका है और इसके तहत सिर्फ जम्मू कश्मीर के लोगों को वहां की स्थायी संपत्ति खरीदने और बेचने का अधिकार है। सरकारी नौकरी पाने का अधिकार है और साथ ही वोटिंग राइट्स हैं। अन्य को ये अधिकार नहीं है। इस मामले में जो संवैधानिक प्रावधान है वह इंगिगरल पार्ट है और राष्ट्रपति का आदेश वैलिड है और इसे दो बार चुनौती दी गई और संवैधानिक बेंच ने चुनौती को खारिज कर दिया था।

दिल्ली बेस्ड एक एनजीओ वी द सिटिजन की ओर से याचिका दायर की गई है। एनजीओ के प्रेसिडेंट संदीप कुलकर्णी ने अगस्त 2014 में याचिका दायर की थी।

याचिका में कहा गया है कि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और ऐसे में जम्मू कश्मीर के लोग और देश के अन्य भाग में रहने वाले लोगों का एक समान अधिकार है और एक ही मूल अधिकार है। और कुछ विशेष नियम के आधार पर उसे अलग नहीं किया जा सकता और इस तरह से 1954 का आदेश संविधान के अनुच्छेद-14 का उल्लंघन है। याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद-35 में बदलाव का अधिकार संसद को है लेकिन इस मामले में राष्ट्रपति के आदेश से इसमें बदलाव किया गया है जो गलत है और अवैध है।