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सरोगेट महिला भी मातृत्व अवकाश का लाभ पाने की हकदार, सरोगेट मां और प्राकृतिक मां के बीच अंतर करना महिला होने का अपमान: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
5 March 2021 7:35 AM GMT
सरोगेट महिला भी मातृत्व अवकाश का लाभ पाने की हकदार, सरोगेट मां और प्राकृतिक मां के बीच अंतर करना महिला होने का अपमान: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
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हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने गुरुवार को कहा कि एक सरोगेट मां भी सीसीएस (लीव) रूल्स, 1972 के नियम 43 (1) के तहत मातृत्व अवकाश का लाभ पाने की हकदार है। यह भी कहा गया है कि यह "महिला होने का अपमान" होगा, यदि एक सरोगेट मां और प्राकृतिक मां के बीच अंतर किया जाता है।

जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस संदीप शर्मा की पीठ ने एक सरोगेट मां की याचिका पर सुनवाई में उक्त टिप्पण‌ियां की हैं। याचिका में सरोगेट मां के लिए भी मातृत्व अवकाश का लाभ पाने की मांग की गई थी।

पीठ ने कहा, "मातृत्व बच्चे के जन्म के साथ समाप्त नहीं होता है, और अनुरोध के बाद मां बनी एक महिला को मातृत्व अवकाश देने से इनकार नहीं किया जा सकता है। जहां तक मातृत्व लाभ का संबंध है, एक महिला के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता है, वह भी केवल इस आधार पर कि उसने गर्भ सरोगेसी के माध्यम से प्राप्त किया है।

एक नवजात को दूसरों की दया पर नहीं छोड़ा जा सकता है, क्योंकि उसे पालन-पोषण की आवश्यकता है और यह सबसे महत्वपूर्ण अवधि है, जिसमें बच्चे को मां की देखभाल और ध्यान की आवश्यकता होती है। जीवन के पहले वर्ष में बच्चे के सीखने की बहुत ज्यादा मात्रा होती है, बच्चा बहुत कुछ सीखता है। स्नेह का एक बंधन भी विकसित होता है।"

याचिकाकर्ता कुल्लू जिले के एक सरकारी स्कूल में संविदा पर भाषा शिक्षक के रूप में कार्य करती है। सरोगेसी के माध्यम से उन्होंने 10 सितंबर, 2020 को एक बच्चे को जन्म दिया।

जिसके बाद, स्कूल के प्रधानाचार्य से मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया, जिसने उस आवेदन को उपनिदेशक, उच्च शिक्षा, कुल्लू को भेज दिया और पूछा कि क्या याचिकाकर्ता सरोगेट मां होने के नाते मातृत्व अवकाश की हकदार है?

हाईकोर्ट ने सरोगेसी के विषय पर आए फैसलों का विश्लेषण करते हुए, बेबी मंजू यामदा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य (2008) 13 एससीसी 518 पर भरोसा किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने पारंपरिक, गर्भावधि, परोपकारी और वाणिज्यिक सरोगेसी समेत, सरोगेसी के विभिन्न रूपों का अवलोकन किया था।

मातृत्व अवकाश के लिए सीसीएस (लीव) रूल्स के नियम 43 का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा, एक बार, उत्तरदाता स्वीकार करते हैं कि बच्चा याचिकाकर्ता का है, तो वह उन छुट्ट‌ियों की हकदार है, जिन्हें नियमों (ibid)के संदर्भ में ऐसे व्यक्तियों को दिया जाता है। उक्त नियमों का उद्देश्य बच्चे और माता-पिता के बीच की बॉन्डिंग के लिए उचि‌त है।"

मामले में डॉ हेमा विजय मेनन बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य AIR 2005 Bom 231 में बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले पर भी भरोसा किया, जिसमें अदालत ने देखा कि "यदि मातृत्व का अर्थ मां बनना है, तो जैविक मां या सरोगेट मां या ऐसी मां, जिसने जन्म से ही बच्चे को गोद लिया है, के बीच अंतर करना उचित नहीं होगा।

मातृत्व अवकाश का उद्देश्य महिला और उसके बच्चे के पूर्ण और स्वस्थ रखरखाव के लिए मातृत्व की गरिमा की रक्षा करना है। मातृत्व अवकाश का उद्देश्य महिलाओं के लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है। "

अनुच्छेद 42 के तहत संवैधानिक संवैधानिक आदेश का अवलोकन करते हुए, जिसके तहत कहा गया है कि राज्य मातृत्व राहत और कार्य के लिए मानवीय और उचित स्थितियों को सुरक्षित करने के लिए प्रावधान करेगा, उच्च न्यायालय ने कहा,

"यह लंबे समय तक महसूस किया गया था कि कामकाजी महिलाएं सेवा की शर्तों के कारण अपने बच्चों को समय नहीं दे पाती हैं। इसलिए, बच्चे की देखभाल सुनिश्चित करने के लिए चाइल्ड केयर लीव की अवधारणा शुरू की गई, ताकि मां को सक्षम बनाया जा सके कि जब भी बच्चे को यह महसूस हो कि उसे देखभाल की जरूरत है, तो वो चाइल्ड केयर लीव का लाभ उठाएं। यह अंतरराष्ट्रीय करार और संधियों के अनुरूप है, जिसमें भारत एक हस्ताक्षरकर्ता है। "

इसलिए, उच्च न्यायालय ने याचिका की अनुमति दी और प्रतिवादी अधिकारियों को सीसीएस (लीव) रूल्स, 1972 के तहत याचिकाकर्ता को मातृत्व अवकाश स्वीकृत/ अनुदान करने का निर्देश दिया।

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