आर्टिकल 15 क्या है? जानिए अपने अधिकारों और भारतीय संविधान के बारे में ये खास बातें

आर्टिकल 15 क्या है? जानिए अपने अधिकारों और भारतीय संविधान के बारे में ये खास बातें

तथ्य की भूल क्षम्य है, लेकिन विधि की भूल अक्षम्य है, इसलिए देश के नागरिकों से यह उम्मीद की जाती है कि वे कानून के बारे में जानकारी रखें। कोई व्यक्ति अपने बारे में यह प्रतिरक्षा नहीं ले सकता कि उसे कानून की जानकारी नहीं है।

भारतीय संविधान के बारे में न केवल न्यायपालिका से जुड़े लोगों को जानना आवश्यक है बल्कि आम आदमी से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वह संविधान और देश के कानून के बारे में पर्याप्य जानकारी रखे।

तथ्य की भूल क्षम्य है, लेकिन विधि की भूल अक्षम्य है, इसलिए देश के नागरिकों से यह उम्मीद की जाती है कि वे कानून के बारे में जानकारी रखें। कोई व्यक्ति अपने बारे में यह प्रतिरक्षा नहीं ले सकता कि उसे कानून की जानकारी नहीं है।

पिछले दिनों आर्टिकल 15 नामक एक फिल्म रिलीज़ हुई। इसके बाद आम लोगों में यह जिज्ञासा जागृत हुई कि आखिर संविधान का आर्टिकल 15 किस बारे में है? आइए जानते हैं।

आर्टिकल 15 :


भारतीय संविधान का आर्टिकल 15 विधि के समक्ष समता के अधिकार बारे में है। अर्थात विधि के लिए सभी नागरिक बराबर हैं और जात पात, धर्म, लिंग के आधार पर नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

आर्टिकल 15 में कही गई बातों की शुरुआत आर्टिकल 14 से होती है, जिसमें दो मुख्य बातें कही गई हैं।

1. आर्टिकल 14 में कहा गया है कि विधि के समक्ष समता, सभी नागरिक समान हैं।

2. विधियों के समान संरक्षण की बात भी आर्टिकल 14 में कही गई है। अर्थात कानून की समान सुरक्षा। इसके कई अर्थ हैं, जिसमें एक यह है कि कोई भी व्यक्ति कानून से बड़ा नहीं है। किसी व्यक्ति को कानून के समक्ष विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होगा।

आर्टिकल 15 समता के अधिकार के बारे में ही हमें आगे बताता है, जो बात आर्टिकल 14 में शुरू होती है, उसे आर्टिकल 15 आगे बढ़ाता है। आर्टिकल 15 समता के अधिकार का विस्तृत विवरण देता है।

संविधान सभा का मानना था कि असमानता के खिलाफ स्पष्ट वर्णन करने के लिए आर्टिकल 14 पर्याप्त नहीं होगा, इसलिए सभा ने विधि के समक्ष समता को समझाने के लिए आर्टिकल 14 से 18 तक इसका वर्णन किया।

आर्टिकल 15 (1) के अनुसार किसी भी जाति, वर्ग, लिंग या धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। राज्य किसी नागरिक से केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी भी आधार पर किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं करेगा।

आर्टिकल 15 का दूसरा उपबंध याने आर्टिकल 15 (2) कहता है कि सार्वजनिक भोजनालयों, दुकानों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश, या राज्य-निधि से पोषित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाबों, स्नानघाटों, सड़कों और सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग में कोई भी विभेद नहीं किया जाएगा। हर नागरिक इनका उपयोग बिना किसी भेदभाव के कर सकता है।

आर्टिकल 15 (3) के अनुसार यदि महिलाओं और बच्चों के लिए स्पेशल प्रोविजन बनाए जा रहे हैं तो आर्टिकल 15 ऐसा करने से नहीं रोक सकता। जैसे महिला आरक्षण या बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा। यूं तो सभी नागरिक समान हैं लेकिन महिलाओं एवं बाल विकास के लिए उठाए गए विशेष कदम में आर्टिकल 15 बाधा नहीं है।

आर्टिकल 15 (4) के अनुसार राज्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग, एससी, एसटी, ओबीसी के लिए स्पेशल प्रोविजन बना सकते हैं। अगर वे कमज़ोर वर्ग के लिए कोई योजना बनाते हैं तो यह आर्टिकल 15 का उल्लंघन नहीं होगा। राज्य सीटों का रिजर्वेशन या फीस में छूट देने जैसे निर्णय ले सकते हैं।

आर्टिकल 15 मौलिक अधिकार भी है और मानव अधिकार भी है। इस तरह हमने देखा कि आर्टिकल 15 भारतीय संविधान के आर्टिकल 14 से आर्टिकल 18 तक के प्रावधानों की अहम कड़ी है, जो समता के अधिकार का वर्णन करता है।