संसद को संविधान में बदलाव करने के अधिकार कहां तक हैं? जानिए प्रक्रिया और महत्वपूर्ण निर्णय

संसद को संविधान में बदलाव करने के अधिकार कहां तक हैं? जानिए प्रक्रिया और महत्वपूर्ण निर्णय

संसद को यह अधिकार है कि वह दोनों सदनों में बहुमत से किसी कानून में बदलाव कर सकती है। ये सभी उसके उदाहरण हैं, लेकिन क्या संसद को यह अधिकार है कि वह संविधान में संशोधन कर सकती है?

अक्सर हम खबरों में देखते, पढ़ते हैं कि संसद में फलां कानून में संशोधन किया गया। हाल ही में लोकसभा में एनआईए एक्ट संशोधन बिल पास हुआ। इसी तरह मोटर व्हिकल एक्ट संशोधन बिल भी संसद के दोनों सदनों में पास हुआ।

संसद को यह अधिकार है कि वह दोनों सदनों में बहुमत से किसी कानून में बदलाव कर सकती है। ये सभी उसके उदाहरण हैं, लेकिन क्या संसद को यह अधिकार है कि वह संविधान में संशोधन कर सकती है? इस सवाल का जवाब हम माननीय सुप्रीम कोर्ट के कुछ निर्णयों की रोशनी में तलाश करेंगे।

भारत के संविधान की बड़ी विशेषताओं में यह भी है कि वह न तो अमेरिका के संविधान की तरह कठोर है और न ही इंग्लैंड के संविधान की तरह लचीला है। संविधान सभा ने संविधान निर्माण के समय बीच का रास्ता अपनाया और परिस्थितियों के अनुसार इसमें संशोधन की गुंजाइश छोड़ी है। भारतीय संविधान के आर्टिकल 368 में संविधान की शक्ति और उसमें संशोधन की प्रक्रिया बताई गई है।

क्या कहता है आर्टिकल 368

भारतीय संविधान का आर्टिकल 368 कहता है कि संसद को एक प्रक्रिया के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है। 1951 से लेकर जनवरी 2019 तक संसद में 103 संविधान संशोधन विधेयक पारित हो चुके हैं। इन तीन बिंदुओं के अंतर्गत संविधान में संशोधन किया जा सकता है।

1. साधारण बहुमत द्वारा संशोधन :

संसद सदस्यों के साधारण बहुमत के द्वारा संविधान में बदलाव किया जा सकता है। ये विषय इस प्रकार हैं।

अ. पहली अनुसूची और चौथी अनुसूची के संशोधन तथा अनुपूरक, अनुषांगिक और पारिणामिक विषयों का उपबंध करने के लिए आर्टिकल 2 और आर्टिकल 3 के अधीन बनाई गईं विधियां (आर्टिकल 4‌)

ब. राज्यों के विधान परिषदों का उस्तादन या सृजन। (आर्टिकल 169)

स. कुछ संघ राज्यों के लिए स्थानीय विधान मंडलों या मंत्रिपरिषदों का दोनों का सृजन।

2. विशेष बहुमत द्वारा संशोधन :

संविधान के कुछ ऐसे विषय हैं, जो संसद के कुल सदस्यों की संख्या का बहुमत और सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो तिहाई बहुमत से किया जाता है। इसे विशेष बहुमत द्वारा संशोधन करना कहते हैं।

इस प्रक्रिया के अंतर्गत वे विषय आते हैं, जो साधरण बहुमत और अति विशेष बहुमत द्वारा किए जाने वाले संशोधन की सूची में शामिल नहीं हैं।

3. अति विशेष बहुमत द्वारा संशोधन :

कुछ विषयों को संविधान में अति विशेष माना गया है और उनमें संशोधन की प्रक्रिया को भी अति विशेष कहा गया है। इन विषयों में संसद सदस्यों का विशेष बहुमत और आधे राज्यों से अधिक का अनुसमर्थन आवश्यक है। ये अति विशेष विषय इस तरह हैं।

1. राष्ट्रपति का निर्वाचन

2. संघ तथा राज्यों की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार

3. संघ तथा राज्य न्यायपालिका

4. संघ तथा राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का विस्तार

5. संघ तथा राज्यों का प्रतिनिधित्व

6. संविधान की सातवीं अनुसूची

7. संविधान में संशोधन की प्रक्रिया

प्रक्रिया :

संविधान संशोधन की प्रक्रिया भी वही है, जो अन्य बिल की ही होती है। पहले इसे संसद के दोनों सदनों में पेश किया जाता है और पास होने के बाद फिर इसे राष्ट्रपति के पास अनुमति के लिए भेजा जाता है। राष्ट्रपति इस पर अपनी अनुमति देने के लिए आबद्ध होता है।

इस संबंध में शंकरी प्रसाद बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (AIR 1951, SC 458) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि संविधान संशोधन की प्रक्रिया संसद के दोनों सदनों में समान महत्व रखती है और दोनों ही सदनों में आर्टिकल 368 की अपेक्षाओं का पूरा होना आवश्यक है।

संविधान संशोधन की सीमा :

संविधान का आर्टिकल 368 भले ही संविधान में संशोधन की शक्ति देता है लेकिन यह शक्ति अनियंत्रित और असीमित नहीं है। संविधान संशोधन की एक सीमा है और जहां कहीं कोई संशोधन संविधान के आधारभूत ढांचे को नष्ट करता हो, वहां संशोधन नहीं किया जा सकता।

केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल (AIR 1973, SC 1461) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आधारभूत ढांचे को संविधान की लक्ष्मण माना और कहा कि संसद द्वारा संविधान में ऐसा कोई संशोधन नहीं किया जा सकता जिससे संविधान का आधारभूत ढांचा नष्ट होता हो।

यह है संविधान का आधारभूत ढांचा :

संविधान के आधारभूत ढांचे में आखिर कौन कौन सी बातें हैं और कौन से विषय इनमें सम्मिलित किए गए हैं। समय समय पर विभिन्न न्यायिक निर्णयों के माध्यम से इसमें विषय जुड़ते रहे हैं। उनमें से कुछ विषय हैं इस तरह हैं।

1. संविधान की सर्वोपरिता

2. संविधान का गणतंत्रात्मक और लोकतांत्रिक स्वरूप

3. संविधान का पंथ निरपेक्ष स्वरूप

4. विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में शक्तियों का पृथ्क्करण

5. संविधान का संघीय स्वरूप

6. देश की एकता, अखंडता और सम्प्रभुता

7. मूल अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों द्वारा सुनिश्चित व्यक्ति की गरिमा

8. कल्याणकारी राज्य की स्थापना

9. विधि शासन

10. न्यायिक पुनर्विलोकन

11. स्वत्रंत और निष्पक्ष चुनाव पर आधारित लोकतंत्र

12. संविधान में संशोधन करने की संसद की सीमित शक्तियां

स्पष्ट हुआ कि संविधान संशोधन की गुंजाइश के साथ उसकी सीमा भी तय कर दी गई है। जहां कहीं यह मौलिक अधिकार, देश की एकता अखंडता सहित संविधान के आधारभूत ढांचे के दायरे में आएगा, वहां संविधान संशोधन नहीं हो सकेगा।