चेक पर जिसे रुपए मिलने हैं, उसका नाम आरोपी ने ख़ुद बदला यह साबित करने की ज़िम्मेदारी शिकायतकर्ता की : केरल हाईकोर्ट

चेक पर जिसे रुपए मिलने हैं, उसका नाम आरोपी ने ख़ुद बदला यह साबित करने की ज़िम्मेदारी शिकायतकर्ता की : केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि जब किसी चेक में जिसको राशि का भुगतान होना है उसका नाम बदला जाता है तो यह साबित करने की ज़िम्मेदारी शिकायतकर्ता की है कि आरोपी ने ख़ुद यह बदलाव किया है या फिर आरोपी की सहमति से ऐसा किया गया है।

न्यायमूर्ति आर नारायण पिशारदी ने ने जीमोल जोसेफ़ बनाम कौशतुभं मामले में यह भी कहा कि अधिनियम की धारा 138 के तहत पावर ऑफ़ अटर्नी के माध्यम से शिकायत दर्ज करना क़ानूनन वैध है।

इस मामले में चेक पर पाने वाले का नाम "कौस्थुभन" (आरोपी का नाम) लिखा था जिसे काटकर उस जगह पर पानेवाले के रूप में शिकायतकर्ता का नाम लिख दिया गया था। नेगोशबल इंस्ट्रुमेंट (एनआई) ऐक्ट की धारा 87 और प्रस्तुत किए गए साक्ष्य के अनुसार अदालत ने पहली अपीली अदालत के फ़ैसले से सहमति जताई जिसमें कहा गया था कि चेक पर पानेवाले के नाम को सही किया गया है पर इसे आरोपी के हस्ताखर से सत्यापित नहीं किया गया है और इस स्थिति में यह असंभव है कि शिकायतकर्ता ने इसे स्वीकार किया हो।

अदालत ने आगे कहा कि अगर एनआई में किसी पक्ष की सहमति के बिना अगर कोई बदलाव होता है तो यह उस इंस्ट्रुमेंट को रद्द करने जैसा है और इस तरह के इंस्ट्रुमेंट के आधार पर कोई आपराधिक कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।

अदालत ने आगे कहा : जो पक्ष बदलाव की अनुमति देता है और जो बदलाव करता है उन्हें इस तरह के बदलाव के ख़िलाफ़ शिकायत का अधिकार नहीं है। अगर चेक जारी करने वाले ने ही बदलाव किया है तो वह बाद में यह कहकर लाभ नहीं उठा सकता कि चेक बेकार हो गया क्योंकि उसमें बदलाव किया गया है। अगर पाने वाले ने चेक में बदलाव किया है और इसका अनुमोदन चेक जारी करने वाले ने किया है तो इस तरह के बदलाव का प्रयोग भी पाने वाले के अधिकार के विरुद्ध नहीं किया जा सकता।

जब चेक में पाने वाले के नाम को बदला गया है तो यह ज़िम्मेदारी शिकायतकर्ता की होती है कि वह साबित करे कि आरोपी ने ख़ुद यह बदलाव किया है या फिर इसमें उसकी भी सहमति है। पीडब्ल्यू 1 और पीडब्ल्यू 2 के साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि चेक पर नाम में बदलाव आरोपी ने ख़ुद किया अठा या फिर उसमें उसकी भी सहमती थी।

चेक के बारे में शिकायत पीओए के माध्यम से दायर हो सकती है

अदालत ने कहा कि पीओए ग्रांटर का एजेंट होता है और वह ग्रांटर के कहने पर क़ानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है। यह सच है कि पीओए होल्डर अपने नाम से कोई शिकायत दर्ज नहीं करा सकता। वह प्रिन्सिपल के ख़िलाफ़ आपराधिक कार्यवाही शुरू कर सकता है और अधिनियम की धारा 138 के पीओए के माध्यम से शिकायत दर्ज करना पूरी तरह वैध है।

आरोपी को हलफ़नामा दायर कर साक्ष्य देने का अधिकार नहीं है

यद्यपि अदालत ने आरोपी को बरी किए जाने को सही ठहराया पर उसने इस बात पर भी ग़ौर किया कि आरोपी ने एक हलफ़नामा दायर कर साक्ष्य दिया था जिसमें उसने कहा था कि उसने ख़ुद के ही नाम पर चेक जारी किया था ताकि वह बैंक से राशि निकाल सके और उसने यह चेक अपने मित्र बाबू को दे दिया था बैंक से राशि निकालने के लिए पर बाबू ने वह चेक खो दिया। अदालत ने इस पर कहा,

अगर कोई व्यक्ति अधिनियम की धारा 138 के तहत एक मामले में आरोपी है तो वह अधिनियम की धारा 145(1) हलफ़नामा दायर कर साक्ष्य नहीं दे सकता। यह अधिकार सिर्फ़ शिकायतकर्ता को ही प्राप्त है।अदालत ने कहा, "जब जिस पार्टी ने किसी को गवाही के लिए बुलाया है उससे उसने पूछताछ नहीं की है तो फिर उससे पूछताछ का सवाल भी नहीं उठता। साक्ष्य अधिनियम की धारा 138 यह कहती है कि गवाह पहले पार्टी ख़ुद अपने गवाह से पूछताछ करे और इसके बाद उससे क्रॉस-इग्ज़ैमिनेशन होगा…"।