मोटर वाहन दुर्घटना के मुआवज़ा पर मिलने वाले ब्याज पर आयकर नहीं लगाया जा सकता, पढ़िए बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला

मोटर वाहन दुर्घटना के मुआवज़ा पर मिलने वाले ब्याज पर आयकर नहीं लगाया जा सकता, पढ़िए बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला

एक महत्त्वपूर्ण फ़ैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि मोटर वाहन दुर्घटना में मिलने वाले मुआवज़ा पर अगर कोई ब्याज दिया जाता है तो उसपर आयकर अधिनियम 1961 के तहत आयकर नहीं लगाया जा सकता क्योंकि यह 'आय' नहीं है।

यह फ़ैसला न्यायमूर्ति अकील कुरेशी और एसजे कठवल्ला ने रूपेश रश्मिकांत शाह की याचिका पर यह फ़ैसला सुनाया। शाह को 40 साल पहले एक कार ने ठोकर मार दिया था जब वह मात्र आठ साल का था और इस वजह से वह बिस्तर पर ही परे रहने के लिए बाध्य हो गया। शाह ने याचिका दायर कर अदालत की राय जाननी चाही कि उसे 36 साल पहले जो मुआवज़ा मिला उस पर मिल रहे ब्याज पर 30% आयकर वसूलना क्या उचित है।

पृष्ठभूमि

रूपेश के साथ दुर्घटना 18 अक्टूबर 1978 को हुई थी जब वह महज़ आठ साल का था। दक्षिण मुंबई के नेपेनसी रोड पर सड़क पार करते हुए उसे एक कार ने ठोकर मार दिया जिसमें वह बुरी तरह घायल हो गया।

उसके दिमाग़ पर काफ़ी चोट लगाई और कई माह तक वह अस्पताल में अचेतावस्था में रहा। इस दुर्घटना की वजह से उसकी दिमाग़ी विकास रुक गया और तब से अब तक वह अपने बिस्तर से नहीं उठ सकता और उसे हमेशा ही हर काम के लिए किसी की मदद की ज़रूरत पड़ती है।

उसके पिता ने मोटर वाहन दुर्घटना दावा अधिकरण में ड्राइवर से एक लाख मुआवज़े के लिए दावा किया जिसे बाद में संशोधित कर 15 लाख कर दिया गया। अधिकरण में एक अन्य दावाकर मुआवज़े की राशि को बढ़ाकर 50 लाख किया गया।

अधिकरण ने दावे का फ़ैसला करने में 12 साल का समय लिया और 30 मार्च 1990 को फ़ैसला सुनाया और ड्राइवर को 4.12 लाख का मुआवज़ा देने को कहा और इसपर दावा का अर्ज़ी दायर करने के दिन से 6% की दर से ब्याज देने को कहा।

इसके बाद रूपेश ने हाईकोर्ट में पहली अपील दाख़िल की जिसका निपटारा 21 नवम्बर 2014 को हुआ और उसे कुल 39.92 लाख का मुआवज़ा दिलाया गया। बीमा कम्पनी ने इस फ़ैसले को चुनौती दी जिसे ख़ारिज कर दिया गया।

अंततः बीमा कम्पनी ने 9% ब्याज की दर से 36 साल के ब्याज के साथ 1.42 करोड़ रुपए जमा करा दिए। पर इस राशि पर स्रोत पर ही आयकर काट लिया गया।

फ़ैसला

इस मामले में वरिष्ठ वक़ील जहांगीर मिस्ट्री अमिकस क्यूरी थे। अदालत ने सारी बातों पर ग़ौर करने के बाद कहा, "यहाँ तक कि विधायिका ने भी इस तरह के करदाताओं की मुश्किलों को समझा है और इसलिए वित्त अधिनियम 2009 की धारा 145A को संशोधित किया गया और यह 1-4-2010 से लागू है।

पीठ ने कहा,

"…हमें पहले ब्याज की सच्ची प्रकृति को सुनिश्चित करना होगा। यहाँ तक कर का आकलन करने वाले अथॉरिटी ने इस आधार पर कार्रवाई की है कि मुआवज़े पर कर नहीं लगाया जा सकता।

ब्याज मुद्रास्फीति को ध्यान में रखकर तय किया जाता है। और इस तरह प्रयास यह है कि उचित मुआवज़ा दिलाया जाए। मुआवज़े को तय करने में हुई देरी की वजह से ब्याज चुकाने को कहा गया है और यह इस प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है"।

अदालत ने अंततः कहा,

"हमारी राय है कि मोटर वाहन दुर्घटनाओं में मुआवज़े पर जो ब्याज दिलाया जाता है उस पर दावे की याचिका दर्ज करने से किसी अपील पर हाईकोर्ट के फ़ैसले के दिन तक के लिए कोई आयकर देय नहीं होगा, क्योंकि वह आय नहीं है"। इस तरह अदालत ने रिट याचिका को स्वीकार कर लिया।

वर्ष 2016 में मद्रास हाईकोर्ट ने कहा था कि एमएसीटी मुआवज़ा 'आय' नहीं है और इस पर कर नहीं लगाया जा सकता (प्रबंध निदेशक, तमिलनाडु राज्य परिवहन निगम बनाम चिन्नदुराई)।