सीआरपीसी की धारा 362 के तहत किसी अदालती आदेश या फ़ैसले की समीक्षा, इसकी वापसी या इसमें बदलाव नहीं किया जा सकता : सुप्रीम कोर्ट [आर्डर पढ़े]

सीआरपीसी की धारा 362 के तहत किसी अदालती आदेश या फ़ैसले की समीक्षा, इसकी वापसी या इसमें बदलाव नहीं किया जा सकता : सुप्रीम कोर्ट [आर्डर पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट के एक आदेश को ख़ारिज करते हुए कहा कि अदालती आदेश की समीक्षा के लिए आवेदन को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए था।

एक वक्ति पर आईपीसी की धारा 364 और 323 के तहत अपराध करने के आरोप थे और उसने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अर्ज़ी देकर अपने खिला एफआईआर को ख़ारिज करने की माँग की। उसकी इस अर्ज़ी के लंबित रहने के दौरान उसके ख़िलाफ़ चार्ज शीट दाख़िल कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने उसकी याचिका ख़ारिज कर दी और याचिकाकर्ता को उचित प्रावधानों के तहत अपने ख़िलाफ़ दायर चार्ज शीट को चुनौती देने का मौक़ा दिया। इसके बाद आरोपी ने एक दूसरी याचिका दायर की जिसमें उसने आदेश की समीक्षा, उसको वापस लेने और उसमें बदलाव करने की माँग की थे। हाईकोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार कर लिया।

शिकायतकर्ता ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और कहा कि हाईकोर्ट को आदेश की समीक्षा के लिए धारा 482 के तहत इस तरह की याचिका को स्वीकार नहीं करना चाहिए था। उसने इसके लिए सीआरपीसी की धारा 362 का हवाला दिया जिसके तहत इसकी मनाही है।

सीआरपीसी की धारा 362 में कहा गया है कि कोई अदालत जिसने मामले को निपटाते हुए अपने आदेश या अंतिम फ़ैसले पर हस्ताक्षर किया है, वह लिपिकीय या अंकगणितीय ग़लती को ठीक करने के अलावा उस आदेश की समीक्षा नहीं कर सकता या उसमें बदलाव नहीं कर सकता। अपील स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा,

हाईकोर्ट ने धारा 482 के तहत याचिका को ख़ारिज करते हुए कहा था कि दूसरे प्रतिवादी पर यह निर्भर होगा कि वह अभियोग लगाए जाने के बाद चाहे तो इसके ख़िलाफ़ अपील कर सकता है। धारा 362 में जो प्रतिबंधातमक प्रावधान हैं, उसको देखते हुए वर्तमान मामला अदालत में टिक नहीं सकता। समीक्षा या सुधार के लिए किसी आवेदन को स्वीकार नहीं किया जा सकता।