क़ैदी के जेल में रहकर स्नातक बनने और कविता लिखने से प्रभावित हुआ सुप्रीम कोर्ट, उसकी मौत की सज़ा को उम्र क़ैद में बदला

क़ैदी के जेल में रहकर स्नातक बनने और कविता लिखने से प्रभावित हुआ सुप्रीम कोर्ट, उसकी मौत की सज़ा को उम्र क़ैद में बदला

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने अगवा और हत्या करने के एक आरोपी को जेल में रहते हुए स्नातक की डिग्री लेने और कविता लिखने पर ग़ौर करते हुए उसकी मौत की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया।

ज्ञानेश्वर सुरेश बोरकर को आईपीसी की धारा 302, 364 और 201 के तहत मौत की सज़ा दी गई थी। उस पर एक नाबालिग़ लड़की 'ऋषिकेश' की हत्या करने का आरोप था।

वरिष्ठ वक़ील आनंद ग्रोवर ने आरोपी द्वारा लिखी गई कविताओं को सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यों की पीठ के संज्ञान में लाया। इस पीठ में न्यायमूर्ति एके सीकरी, एस अब्दुल नज़ीर और एम आर शाह शामिल हैं। वक़ील ने कहा कि ये कविताएँ उसकी वर्तमान मनोदशा का वर्णन करती हैं और यह कि उसे अपनी ग़लती का एहसास हो गया है जो उसने उस समय किया था जब वह 22 साल का था। वक़ील ने यह भी कहा कि उसमें सुधार हो सकता है। जेल में 18 साल बिताने के बाद ना केवल उसने सबक़ सीखी है बल्कि वह यह महसूस करता है कि उसने ग़लती की है और अब सभ्य व्यक्ति बनने का प्रयास कर रहा है, उसने BA की डिग्री ली है, गांधी रीसर्च फ़ाउंडेशन, जलगांव द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया है।

इस दलील पर ग़ौर करने के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा,

"जिस समय यह अपराध हुआ उस समय आरोपी 22 साल का था; अब उसके बाद उसने 18 साल जेल में बिताई है; जेल में उसका व्यवहार अच्छा रहा है; आरोपी ने समाज में शामिल होने का प्रयास किया है, एक सभ्य व्यक्ति बनने का प्रयास किया है और जेल में रहते हुए स्नातक की डिग्री ली। उसने ख़ुद में सुधार करने का प्रयास किया है; उसने जेल में रहते हुए जो कविताएँ लिखीं हैं उससे यह लगता है कि उसने अपनी ग़लती को स्वीकार किया है, यह ग़लती उसने उस समय की थी जब वह 22 साल का था और उसमें सुधार हो सकता है; इसलिए अपीलकर्ता में सुधार हो सकता है और उसका पुनर्वास हो सकता है।

पीठ ने कहा कि इस बात की संभावना है कि अब वह दुबारा इसी तरह का अपराध नहीं करेगा और समाज के लिए ख़तरा नहीं होगा। "यह ध्यान में रखना ज़रूरी है कि आरोपी को पहले सज़ा नहीं मिली हुई है और वह पेशेवर हत्यारा नहीं है। अपराध होने के समय वह सिर्फ़ 22 साल का था और जेल में उसका व्यवहार भी अच्छा रहा है", पीठ ने कहा।