टाडा अधिनियम के तहत दर्ज किए गए बयान को टाडा कोर्ट किसी अन्य क़ानून के तहत दर्ज मामले में प्रयोग नहीं कर सकता : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

टाडा अधिनियम के तहत दर्ज किए गए बयान को टाडा कोर्ट किसी अन्य क़ानून के तहत दर्ज मामले में प्रयोग नहीं कर सकता : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि टाडा प्रावधानों के तहत दर्ज किए गए किसी आरोपी के बयान को उस आरोपी के ख़िलाफ़ किसी अन्य मामले में प्रयोग नहीं किया जा सकता ख़ासकर तब जब विशेष अदालत ने उचित अधिकार नहीं होने के कारण टाडा के तहत मामले का संज्ञान नहीं लिया है।

वर्तमान मामले में विशेष टाडा अदालत ने आरोपी को इस आधार पर बरी कर दिया था कि टाडा की धारा 20 के तहत पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी और न ही यह क़ानूनसम्मत था।

राज्य ने इस आदेश के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

कोर्ट के इस मत से सहमत पीठ ने कहा, "हमें यह जानकर आश्चर्य हो रहा है कि कैसे सिर्फ़ एक वाकी टाकी रखने की वजह से किसी पर टाडा क़ानून की धारा 4 और 5 लागू हो सकती है…वाकी टाकी कोई वर्गीकृत हथियार या गोलाबारूद नहीं है। हमारी राय में कथित Exh. 57 को लागू करने में भी बुद्धि का उपयोग नहीं किया गया है।"

हालाँकि कोर्ट ने कहा कि विशेष अदालत टाडा के तहत मामले की सुनवाई कर रहा है वह आरोपी के ख़िलाफ़ अन्य आपराधिक मामलों की सुनवाई भी कर सकता है अगर यह अपराध टाडा के तहत हुए अपराधों से जुड़ा हुआ है। विशेष अदालत को इस बारे में अंतर्निहित अधिकार मिले हुए हैं ताकि वह आरोपी को सज़ा दे सके अगर आरोपी के ख़िलाफ़ अपराध के स्वीकार्य सबूत हैं। पर पीठ ने कहा कि

"वर्तमान मामले में, यह देखा जा सकता है कि अभियोजन ने आवश्यक रूप से टाडा के तहत दिए गए आरोपी के बयान पर अपनी निर्भरता दिखाई है। पर यह बयान कोर्ट में स्वीकार्य नहीं है…विशेषकर तब जब विशेष अदालत ने टाडा के तहत अपराधों का संज्ञान नहीं लिया है क्योंकि उसको इसकी अनुमति नहीं है…इसके अलावा वर्तमान मामले में अभियोजन ने तलाशी और बरामदगी की जो रिपोर्ट पेश की है उसमें कई ख़ामियाँ हैं। हम विशेष अदालत ने जो मत व्यक्त किया है उससे अलग हटना नहीं चाहते की प्रतिवादी के ख़िलाफ़ ऐसे आरोप नहीं हैं जिसे कोर्ट में स्वीकार किया जा सके ताकि उसके ख़िलाफ़ टाडा के अतिरिक्त मामलों में आरोपों का निर्धारण हो सके।"