हर संत एक अतीत है और हर पापी का एक भविष्य है : बॉम्बे हाईकोर्ट ने डकैती के आरोप में सज़ा पाए लड़कों को दी राहत [निर्णय पढ़े]

हर संत एक अतीत है और हर पापी का एक भविष्य है : बॉम्बे हाईकोर्ट ने डकैती के आरोप में सज़ा पाए लड़कों को दी राहत [निर्णय पढ़े]

एक फ़ैसला सुनाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऑस्कर वाइल्ड को उद्धृत किया। कोर्ट ने कहा कि परिस्थितियाँ ऐसी थीं जिसकी वजह से इन लोगों को क़ानून को तोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा।

नागपुर पीठ के न्यायमूर्ति एसबी शुक्रे और न्यायमूर्ति एसएम मोदक एक आपराधिक मामले को लेकर रिट पेटीशन की सुनवाई कर रहे थे जिसे 21 साल के आकाश देशपांडे और 23 साल के निकुंज साधवानी नेदायर किया था। ये दोनों ही सीआरपीसी की धारा 427 के तहत राहत की माँग कर रहे थे क्योंकि उन्हें सात अलग-अलग मामलों में सज़ा मिली थी जो एक के बाद एक चलनी थी।

पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ताओं को डकैती के आरोप में आईपीसी की धारा 392 और 393 के तहत दोषी पाया गया था और कुल सात मामलों में उन्हें सज़ा सुनाई गई थी। दोनों पर चार मामलों में मुक़दमा चलाया गयाथा। और दो मामलों में दोनों पर एक साथ मामला चला था। इस मामले में आबिदखान@सलमान मुख़्तार खान पठान बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में आए फ़ैसले पर भरोसा किया गया जिसमें राज्य नेएक के बाद दूसरी सज़ा चलाने की बात कही गई थी।

फ़ैसला

मुद्दा यह था कि अलग-अलग अपराध और उसमें मिली सज़ा जो दो अलग-अलग अदालतों द्वारा दी गई है, क्या याचिकाकर्ता को साथ-साथ चलने वाली सज़ा से महरूम कर सकता है, कोर्ट ने कहा।

कोर्ट ने कहा कि बंदियों को किस तरह से देखा जाए इस बारे में अब बहुत कुछ बदल गया है। क़ैदियों को अब एक मानव माना जाता है और इसलिए अब उन परिस्थितियों पर ध्यान दिया जाता है जिसनेउसे क़ानून को धता बताने को बाध्य किया। इस तरह के क़ैदियों के पुनर्वास पर भी अब ध्यान दिया जाता है। इस बारे में में ऑस्कर वाइल्ड को उद्धृत करना चाहूँगा जिन्होंने कहा था कि "हर अच्छेव्यक्ति का एक इतिहास होता है जबक हर बुरे व्यक्ति का एक भविष्य"।

कोर्ट ने पाया कि आकाश को 24 साल और निकुंज को 21 साल की सज़ा दी गई थी। कोर्ट ने कहा,

"…याचिकाकर्ता नम्बर 1 और 2 को लगभग 2040 और 2037 तक जेल में रहना होगा। हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि इन दोनों ने लोगों को लूटा है… वे कुछ लोगों को ही लूटकर संतुष्ट नहीं थे।उन्होंने निश्चय ही ऐसा कमाई के लिए करते थे। उन्होंने ग़लत रास्ता अपनाया है। अब तक उन्होंने ज़रूर यह समझ लिया होगा कि इससे उन्हें ज़लालत और अपने परिवार और समाज का साथ छूटने केअलावा और कुछ नहीं मिला। ये याचिकाकर्ता क्रमशः 21 और 23 साल के हैं। इसलिए वे जब जेल से बाहर आएँगे (2040 और 2037 में) तो वे 45 साल के हो जाएँगे। इस तथ्य ने हम सब को विचलितकर दिया है।

इस तरह सुधार का यह सिद्धांत हमें इस बारे में थोड़ा नरम रूख अपनाने पर बाध्य किया है। हम नहीं चाहते कि दोनों याचिकाकर्ताओं की जवानी जेल में बर्बाद हो। अब तक उन्होंने यह समझ लियाहोगा कि उन्होंने जो पाप किया है उसका फल क्या होता है। इसलिए हम उनकी सज़ा को एक के बाद एक चलने के बदले साथ चलने में बदल रहे हैं।