मुक़दमादार कोर्ट के आदेश के आधार जो राय बनाता है उसको आधार पर अवमानना की कार्रवाई नहीं शुरू की जा सकती : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

मुक़दमादार कोर्ट के आदेश के आधार जो राय बनाता है उसको आधार पर अवमानना की कार्रवाई नहीं शुरू की जा सकती : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना की एक कार्रवाई को निरस्त करते हुए कहा कि मुक़दमादार किसी कोर्ट आदेश के आधार पर जो राय बनाता है उसको आधार बनाकर ख़िलाफ़ अवमानना की कार्रवाई नहीं की जा सकती। अवमानना की कार्रवाई तभी की जा सकती है जब यह लगे कि मामला जानबूझकर कोर्ट के अपमान का है।

उत्तर प्रदेश जल निगम के तहत कुछ कर्मचारियों ने Badri Vishal Pandey vs. Rajesh Mittal मामले के तहत निगम के ख़िलाफ़ अवमानना की याचिका दायर की थी। इन लोगों ने आरोप लगाया था कि ख़ाली पदों पर उनको नियुक्ति नहीं दी गई या उन्हें दुबारा इन पदों पर बहाल नहीं किया गया जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेष अनुमति याचिका पर अपने फ़ैसले में आदेश दिया था।

रेकर्ड की जाँच के बाद न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा कि विशेष अनुमति याचिका के पक्षकार रहे कर्मचारियों को कार्य पर वापस लेने का आदेश नहीं दिया गया था और इसलिए ये लोग इस आदेश के आधार पर नौकरी पर रखे जाने के अधिकार का दावा नहीं कर सकते।

"…कोर्ट के आदेश की इस धारणा के आधार पर व्याख्या नहीं की जा सकती कि याचिकाकर्ता उसके बारे में क्या सोचता है…"

इन लोगों की दलील को निरस्त करते हुए कोर्ट ने आगे कहा, "इस आदेश में इस कोर्ट ने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया है कि याचिकाकर्ताओं को उनके पद पर बहाल किया जाए या उनको न्यूनतम या नियमित वेतनमान में रखा जाए। अवमानना की कार्रवाई को सिर्फ़ इस धारणा आधार पर नहीं शुरू किया जा सकता जब कि कोर्ट ने इस तरह का कोई निर्देश दिया ही नहीं…अवमानना तब होगी जब इस कोर्ट के आदेश का जानबूझकर उल्लंघन होता है। चूँकि कोर्ट का आदेश इन लोगों को नौकरी पर दुबारा रखने की नहीं है इसलिए ये याचिकाकर्ता अवमानना की आड़ में नौकरी पर दुबारा रखे जाने की माँग नहीं कर सकते विशेषकर जब कोर्ट ने इस तरह का कोई आदेश दिया ही नहीं।"