पिता से मिली वंशागत संपत्ति,बेटों के हाथों में आने पर बन जाती है संयुक्त पारिवारिक संपत्ति-सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

पिता से मिली वंशागत संपत्ति,बेटों के हाथों में आने पर बन जाती है संयुक्त पारिवारिक संपत्ति-सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि पिता से वंशागत तौर पर मिली संपत्ति बेटों के हाथ में आने के बाद संयुक्त परिवार की संपत्ति बन जाती है।

जस्टिस ए.एम खानविलकर और जस्टिस अजय रस्तोगी की पीठ ने यह निर्णय डोडामुनियप्पा (एलआरएस के जरिए) बनाम मुनिस्वामी व अन्य के मामले में दिया है।
क्या था मामला
प्रतिवादी मुनिस्वामी व पांच अन्य एक चिकन्ना नामक व्यक्ति के पौत्र है,जिसकी संपत्ति से संबंधित यह मामला है। वर्ष 1980 में इन्होंने केस दायर कर मांग की थी कि उनके पिता ने अपने दो भाईयों के साथ मिलकर एक डोडामुनियप्पा(जो सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता है) से समझौता किया था,वो उन पर लागू न किया जाए या वो उससे बाध्य नहीं है। यह समझौता एक कार्यान्वयन अपील था,जिसमें प्रतिवादियों के पिता व चाचाओं ने अपनी संयुक्त पारिवारिक संपत्ति का एक हिस्सा याचिकाकर्ता को दे दिया था। यह संपत्ति मूलरूप से चिकन्ना के परिवार ने खरीदी थी। जिसकी मौत के बाद यह संपत्ति उसके तीन बेटे को मिल गई,जिनमें प्रतिवादियों का पिता भी शामिल है।वर्ष 1950 में उन्होने एक अन्य व्यक्ति को सपंत्ति बेच दी। हालांकि बिक्री की डीड में पुनर्हस्तांतरण का नियम रखा गया था कि अगर वह भविष्य में संपत्ति को बेचेगा तो उन्हीं को वापिस कर देगा। परंतु खरीददार ने इस नियम का पालन न करते हुए यह संपत्ति वर्ष 1962 में डोडामुनियप्पा को बेच दी। इसी पुनर्हस्तांतरण नियम को लागू करवाने की मांग करते हुए चिकन्ना के बेटों ने वर्ष 1964 में केस दायर किया था। मामला उनके पक्ष में गया और पुनर्हस्तांतरण को लागू करवाते हुए वर्ष 1974 में उनको संपत्ति वापिस मिल गई। परंतु इसके बाद डोडामुनियप्पा ने कार्यान्वयन अपील दायर कर दी। इसी दौरान एक समझौता हुआ और डोडामुनियप्पा को संपत्ति को कुछ हिस्सा दे दिया गया। इसी समझौते को चुनौती देते हुए सभी वादी ने (जो सुप्रीम कोर्ट में प्रतिवादी है) केस दायर कर दिया और दलील दी कि यह समझौता उन पर लागू नहीं होता है क्योंकि यह उनकी सहमति या जानकारी के बिना किया गया था। परंतु निचली अदालत ने उनको केस यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वादी यह साबित नहीं कर पाए कि उनके पास जो संपत्ति है,वह संयुक्त परिवार की संपत्ति है। परंतु हाईकोर्ट ने उनकी अपील पर इसके विपरीत फैसला दिया और कहा कि वह समझौता किसी भी वादी पर लागू नहीं होता है।
इसी आदेश को चुनौती देते हुए डोडामुनियप्पा ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी।
फैसला
श्रीमति दीपो बनाम वस्सन सिंह व अन्य (1983)3 एससीसी 376 मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि पिता से वंशागत तौर पर मिली संपत्ति बेटों के हाथ में आने के बाद संयुक्त परिवार की संपत्ति बन जाती है।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस देसाई व चिन्नाप्पा रेड्डी की पीठ ने इस मामले के फैसले में कहा था कि -
''एक व्यक्ति को अपने तीन तात्कालिक पूर्वजों से संपत्ति विरासत में मिलती है वह उसके रखने का हकदार है और जरूर हकदार है अपने बेटों,बेटों के बेटे और बेटों के बेटों के बेटे के साथ सहदायिकता में यही तालमेल रहता है,लेकिन अन्य संबंधों के अनुसार वह इसे धारण करता है और इसे धारण करने का हकदार है,पूर्ण संपत्ति के रूप में। ''
''सहदायिक को विरासत की संपत्ति में जो हिस्सा बंटवारे के तौर पर मिलता है,वह एक वंशागत या विरासत की संपत्ति ही है,जो उसके पुरूष के मुद्दे के संबंध में है। वे जन्म से इसमें रूचि लेते है,चाहे वे विभाजन के समय अस्तित्व में हो या बाद में पैदा हुए हो।''
इस प्रिसींपल को लागू करते हुए कोर्ट ने माना कि इस मामले में पुनर्हस्तांतरण डीड वर्ष 1974 में कार्यान्वयन हुई थी। उस समय संपत्ति को संयुक्त परिवार की संपत्ति माना जाएगा। इसलिए यह सपंत्ति सभी वादी के हाथो में वंशागत संपत्ति थी और जो समझौता किया गया था,वह उनकी जानकारी के बिना किया है और उनकी सहमति नहीं ली गई। इसलिए वह समझौता इन पर लागू नहीं होता है। कोर्ट ने कहा कि-
''जब एक बार सात मार्च 1974 के कोर्ट की डिक्री या आदेश के बाद विवादित संपत्ति को वापिस उसके पुराने चरित्र या संयुक्त परिवार की संपत्ति के रूप में लौटा दिया गया था तो विवाद का कोई मतलब नहीं रहता है। कार्यान्वयन अपील के दौरान पक्षकारों के बीच कोई समझौता नहीं हुआ और जो समझौता हुआ था वह मामले के प्रतिवादियों की जानकारी के बिना किया गया था। इसलिए वह समझौता प्रतिवादी नंबर एक से छह पर लागू नहीं होता है और हाईकोर्ट ने यह मानकर सही निर्णय दिया है।''