राजस्थान हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील दायर करने की समय सीमा 90 दिन तय की

राजस्थान हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील दायर करने की समय सीमा 90 दिन तय की

राजस्थान हाईकोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 19 और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 28 के तहत निहित प्रावधानों के बीच सामंजस्य स्थापित करते हुए कहा है कि परिवारिक या फैमिली कोर्ट के एक फैसले में अपील दायर करने की सीमा या मियाद या परिसीमन की अवधि 90 दिन मानी जाएगी।

यह आदेश दो प्रावधानों के बाद से बनी हुई भ्रम की स्थिति को संबोधित करते हुए दिया गया है। हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अपील ,आदेश की तारीख के 90 दिन के अंदर दायर करना निर्धारित किया गया है, जबकि कुटुम्ब न्यायालय अधिनियम 1984 में अपील दायर करने के लिए केवल 30 दिनों की अवधि निर्धारित की गई है।

''सावित्री पांडे बनाम प्रेमचंद्र पांडे, एआईआर 2002 एससी 591'' मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए एक सुझाव के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम के तहत सीमा या मियाद की अवधि में संशोधन किया गया था। यह देखा गया कि धारा 28 (4) के तहत अपील दाखिल करने के लिए निर्धारित सीमा की अवधि अपर्याप्त थी और ''बेईमान मुकदमेबाज जीवनसाथियों'' के लिए विवाहों की निष्फलता को सुविधाजनक बना रही थी।

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि,

''दूरी, भौगोलिक स्थिति, पार्टियों की वित्तीय स्थिति और एक नियमित अपील दायर करने के लिए आवश्यक समय, अगर इन बातों को ध्यान में रखा जाए तो निश्चित रूप से यह पता चल जाएगा या दिख जाएगा कि अपील दायर करने के लिए निर्धारित 30 दिनों की अवधि अपर्याप्त और अनुचित है।

अपील के अभाव में, दूसरा पक्ष विवाह कर सकता है और दूसरे पक्ष की अपील के अधिकार को निष्फल या व्यर्थ करने की कोशिश करता है जैसा कि तत्काल मामले में किया गया है। हमारा विचार है कि अधिनियम के तहत किसी भी निर्णय और डिक्री के खिलाफ अपील दायर करने के लिए 90 दिनों की न्यूनतम अवधि निर्धारित की जा सकती है और उपरोक्त अवधि के दौरान किया गया कोई भी विवाह शून्य माना जाएगा।

इस संबंध में उचित कानून बनाने की आवश्यकता है। हम रजिस्ट्री को निर्देशित करते हैं कि इस फैसले की प्रति कानून और न्याय मंत्रालय को भेजी जा सकती है ताकि इस संबंध में उनको जो उचित लगे वह कार्रवाई कर सकते हैं।''

इसी तरह का विचार बॉम्बे हाईकोर्ट के एक पूर्ण पीठ द्वारा ''शिवराम डोडन्ना शेट्टी बनाम शर्मिला शिवराम शेट्टी, 2017 (1) एमएच.एल.जे. 281''में लिया गया था।

पीठ ने कहा कि-

''प्रावधानों में संशोधन करते समय, संसद को अधिनियम 1984 के अस्तित्व के बारे में पता था। यह माना जाता है कि संसद को विषय से संबंधित एक अन्य कानून के अस्तित्व,फोरम और प्रक्रिया और मियाद की अवधि के बारे में जानकारी थी। इसलिए, ऐसी सामंजस्यपूर्ण व्याख्या, जो कानून की वस्तु और उद्देश्य को आगे बढ़ाए, उसे अपनाना होगा।

अधिनियम 1955 में संसद द्वारा वर्ष 2003 में संशोधन किया गया था, इस प्रकार ,बाद के कानून द्वारा निर्धारित नब्बे दिनों की सीमा की अवधि, पूर्ववर्ती अधिनियमन या अधिनियम 1984 में निर्धारित सीमा की अवधि से संबंधित प्रावधानों को समाप्त कर देगी।''

इस प्रकार, न्यायमूर्ति मोहम्मद रफीक और न्यायमूर्ति नरेन्द्र सिंह धड्ढा की पीठ ने माना कि-

''हम बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण का पालन करने के लिए इच्छुक हैं, चूंकि इसी तरह का दृष्टिकोण श्रीमती अनिता चैधरी (सुप्रा) के मामले में इस न्यायालय द्वारा भी लिया गया था। चूंकि यह अपील 90 दिनों के भीतर दायर की गई है, जो अधिनियम 1955 की धारा 28 (4) के तहत निर्धारित मियाद की अवधि है। इसलिए इस अपील को सीमा या मियाद के भीतर दायर अपील माना जाएगा।''

अदालत ने हाईकोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि ऐसे सभी अपीलें ,जो 90 दिन की अवधि के अंदर फैमिली कोर्ट द्वारा पारित किए गए निर्णय और डिक्री के खिलाफ दायर की गई है, उनको मियाद की अवधि के दौरान दायर की गई अपील माना जाए।

''कुलदीप यादव बनाम अनीता यादव''की अपील में यह आदेश जारी किया गया था, जिस पर 57 दिनों की देरी से दाखिल किए जाने के कारण रजिस्ट्री ने रोक लगा दी थी या जिसे 57 दिनों की देरी से दाखिल किए जाने के कारण रजिस्ट्री ने मियाद से वर्जित या परिसीमन से बाहर माना था।

इस मामले में दलीलें याचिकाकर्ता की तरफ से एडवोकेट गणेश खन्ना ने एडवोकेट शिवेन गुप्ता की सहायता से दी थी।