जम्मू-कश्मीर के पुनर्वास कानून की संवैधानिक वैधता : राज्य ने SC को बताया कि कोई आवेदन नहीं मिला, सुनवाई टालने की गुहार

जम्मू-कश्मीर के पुनर्वास कानून की संवैधानिक वैधता : राज्य ने SC को बताया कि कोई आवेदन नहीं मिला, सुनवाई टालने की गुहार

जम्मू-कश्मीर के पुनर्वास कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर हलफनामा दाखिल करते हुए जम्मू- कश्मीर राज्य की ओर से कहा गया है कि इस कानून के तहत कोई भी आवेदन सरकार को नहीं प्राप्त नहीं हुए है क्योंकि इस कानून को नोटिफाइड नहीं किया गया था।वहीं राज्य की ओर से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टालने के लिए लैटर भी सर्कुलेट किया गया है और कहा गया है कि ये कानून विधानसभा ने पास किया था और इस वक्त राज्य में कोई चुनी हुई सरकार नहीं है इसलिए मामले की सुनवाई टाल दी जाए। वैसे इस मुद्दे पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है।

इससे पहले 13 दिसंबर को याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस के कौल और जस्टिस के एम जोसेफ की पीठ ने जम्मू-कश्मीर सरकार से कहा कि इस कानून में वंशज शब्द को स्पष्ट रूप से परिभाषित करे। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता की शिकायत वंशज शब्द है और ऐसे में ये साफ होना चाहिए कि वंशज कौन हैं क्योंकि अधिनियम के प्रावधान 4 (सी) को चुनौती दी गई है।

इस दौरान जस्टिस एसके कौल ने सरकार से पूछा था कि कानून के तहत कितने आवेदन प्राप्त हुए हैं तो जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि चूंकि इस कानून पर रोक लगाई गई है इसलिए अधिनियम अभी तक लागू नहीं किया गया है। हालांकि जम्मू-कश्मीर सरकार के वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि जो लोग 1947 में कश्मीर छोड़ चुके थे, वे वंशज हो सकते हैं लेकिन यह उनका निजी विचार है और वह सरकार से इस बारे निर्देश लेंगे। इस पर पीठ ने सुनवाई को स्थगित करते हुए कहा कि इस पर सुनवाई जनवरी में होगी।

दरअसल राज्य अधिनियम, 1982 जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासियों के राज्य में पुनर्वास या स्थायी वापसी के लिए परमिट देने के लिए बनाया गया जिनके वंशज, 1 मार्च, 1947 और 14 मई, 1954 के बीच पाकिस्तान चले गए थे।

वरिष्ठ नेशनल कांफ्रेंस के नेता अब्दुल रहीम रादर द्वारा 8 मार्च, 1980 को पेश किए गए जम्मू-कश्मीर पुनर्वास विधेयक को तत्कालीन एनसी सरकार द्वारा केंद्र की कांग्रेस सरकार को भेजा गया था। हालांकि जम्मू-कश्मीर विधायिका के दोनों सदनों ने अप्रैल 1982 में विधेयक पारित किया और फिर राज्यपाल बी के नेहरू ने इसे पुनर्विचार के लिए वापस कर दिया। जब विधेयक को दोनों सदनों द्वारा फिर से पारित किया गया तो राज्यपाल को अपनी सहमति देनी पड़ी। हालांकि फिर तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह ने इसकी संवैधानिक वैधता के संबंध में अदालत की राय लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास संदर्भ के लिए भेजा। मामला अदालत में लगभग दो दशकों तक लंबित रहा। आखिरकार CJI एस पी बरोचा के नेतृत्व में पांच सदस्यीय संवैधानिक खंडपीठ ने इसे 8 नवंबर, 2001 को बिना उत्तर दिए वापस कर दिया। इस दौरान जम्मू की पैंथर्स पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इस कानून को चुनौती दी।