ब्रेकिंग : सबरीमला में सभी आयु की महिलाओं के प्रवेश के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

ब्रेकिंग : सबरीमला में सभी आयु की महिलाओं के प्रवेश के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

केरल के सबरीमला मंदिर मामले में शाम 3 बजे तक चली मैराथन सुनवाई के बाद 5 जजों की संविधान पीठ ने 28 सितंबर 2018 के फैसले पर दाखिल 54 पुनर्विचार याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले द्वारा सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार घोषित किया गया था।

चीफ जस्टिस गोगोई, जस्टिस ए. एम. खानविलकर, जस्टिस आर. एफ. नरीमन, जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संविधान पीठ ने बुधवार को याचिकाकर्ताओं और उत्तरदाताओं की दलीलें सुनने के बाद ये फैसला सुरक्षित रखा।

सुबह के वक्त वरिष्ठ वकील के. परासरन, वी. गिरी, ए. एम. सिंघवी, शेखर नाफडे़ और आर. वेंकटरमणि ने याचिकाकर्ताओं के लिए दलीलें प्रस्तुत कीं, जिसमें नायर सर्विस सोसाइटी, मंदिर के तंत्रा और त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष शामिल हैं। उन्होंने अनिवार्य रूप से तर्क दिया कि मंदिर में ये अभ्यास देवता के ब्रह्मचर्य चरित्र पर आधारित था।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि संवैधानिक नैतिकता एक व्यक्तिपरक परीक्षा है जिसे आस्था के मामलों में लागू नहीं किया जाना चाहिए। तर्कसंगतता के आधार पर धार्मिक मान्यताओं का परीक्षण नहीं किया जा सकता। पूजा का अधिकार देवता की प्रकृति और मंदिर की आवश्यक प्रथा के अनुरूप होने का अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि निर्णय में ऐतिहासिक रूप से सबरीमाला मंदिर के लिए अनुच्छेद 17 के तहत "अस्पृश्यता" की अवधारणा की गलत तरीके से व्याख्या की और वो भी बिना इसकी ऐतिहासिकता को समझे।

अदालत में वकील साई दीपक और गोपाल शंकरनारायणन ने भी दलीलों दीं जो याचिकाकर्ताओं में से 2 की ओर से पेश हुए थे। अन्य याचिकाकर्ताओं के वकीलों को 7 दिनों के भीतर अपनी लिखित दलील प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।

केरल सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील जयदीप गुप्ता ने दाखिल की गई पुनर्विचार याचिकाओं का विरोध किया। उन्होंने कहा कि पुनर्विचार के लिए कोई आधार नहीं बनाया गया है। किसी व्यक्ति के मंदिर के आवश्यक अभ्यास को धर्म का आवश्यक अभ्यास नहीं माना जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि हिंदू धर्म में महिलाओं को प्रवेश ना देना धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं है।

त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी के माध्यम से इन याचिकाओं का विरोध किया। बोर्ड के रुख में बदलाव को देखकर जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने सवाल किया कि ये बोर्ड का उल्टा रुख है। इस पर वकील ने जवाब दिया कि बोर्ड ने अदालत के फैसले का सम्मान करने का निर्णय लिया है। इससे पहले बोर्ड ने हर आयु की महिला के मंदिर में प्रवेश का विरोध किया था।

इस दौरान मंदिर में प्रवेश करने वाली 2 महिलाओं बिंदू और कनक दुर्गा की वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने अदालत को बताया कि उन्हें मंदिर में प्रवेश के बाद तीव्र खतरों का सामना करना पड़ रहा है। यह केवल बहिष्कार का मामला नहीं बल्कि सामाजिक बहिष्कार है। मंदिर में प्रवेश के बाद किए गए शुद्धिकरण अनुष्ठान से अदालत की ये बात साबित होती है कि प्रथा में अस्पृश्यता की मात्रा थी। उन्होंने कहा कि महिलाओं को प्रदूषित और अपवित्र माना जाता है।

उन्होंने कहा कि उन महिलाओं के लिए सुरक्षा का आश्वासन देने के लिए सकारात्मक दिशा-निर्देश मांगे गए हैं, जिन्होंने अपने लिए मंदिर खुलने के दिन (12 फरवरी) को मंदिर में प्रवेश करने के लिए ऑनलाइन बुकिंग की है। उन्होंने यह भी कहा कि भीड़ को मंदिर जाने के महिलाओं के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

पीठ ने एक हस्तक्षेपकर्ता की दलीलें भी सुनीं, जिन्होंने अदालत के सामने यह दलील दी कि ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिए 10-50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध आवश्यक है। ये सब दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में 28 सितंबर 2018 के 5 जजों के संविधान पीठ के फैसले को लेकर पुनर्विचार याचिकाएं, जनहित याचिकाएं की गई हैं। अदालत के फैसले में 4:1 के बहुमत से कहा गया था कि सभी उम्र की महिलाएं केरल के सबरीमला मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं। पीठ ने 10 से 50 आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक की परंपरा को अंसवैधानिक करार दिया है। इससे पहले संविधान पीठ में शामिल चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा रिटायर हो चुके हैं और उनकी जगह चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने ली है।