अस्थाना को CBI का स्पेशल निदेशक बनाने के खिलाफ कॉमन कॉज की क्यूरेटिव याचिका भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की

अस्थाना को CBI का स्पेशल निदेशक बनाने के खिलाफ कॉमन कॉज की क्यूरेटिव याचिका भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की

हाल ही में छुट्टी पर भेजे गए सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर अस्थाना की नियुक्ति को चुनौती देने की क्यूरेटिव याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

11 दिसंबर को चैंबर में हुई सुनवाई में जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस ए के सीकरी और जस्टिस ए एम सपरे की पीठ ने फैसला देते हुए कहा है कि रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा  अन्य  2002 (4) SCC 388 के फैसले में दिए गए मानकों के मुताबिक इस याचिका में कोई केस निकलकर नहीं आया है इसलिए ये याचिका खारिज की जाती है। हालांकि इस फैसले का ताजा विवाद पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा जिसमें आरोपों के चलते अस्थाना को छुट्टी पर भेजा गया है।

दरअसल 28 नवंबर 2017 को  सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर अस्थाना की नियुक्ति को चुनौती देने वाली कॉमन कॉज की याचिका को खारिज कर दिया था। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद 24 नवंबर  को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। जस्टिस आरके  अग्रवाल और जस्टिस ए एम सपरे  की बेंच ने ये सुनवाई की थी।

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने याचिका का विरोध करते हुए राकेश अस्थाना की नियुक्ति को जायज ठहराया था। उन्होंने कहा था कि अस्थाना का बेहतरीन कैरियर रहा है। वो कोयला घोटाला, किंगफिशर, एयरलाइंस केस, अगस्ता वेस्टलैंड सहित कई हाईप्रोफाइ मामलों में जांच की जिम्मेदारी निभा चुके हैं।

 वहीं याचिकाकर्ता संगठन की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने राकेश अस्थाना की नियुक्ति को गैरकानूनी बताया था। उन्होंने कहा कि स्टरलिंग बायोटेक लिमिटेड के दफ्तरों में पड़े आयकर छापों में मिली डायरी में उनका नाम सामने आया था। लिहाजा सीबीआई विशेष निदेशक जैसे पद पर उनकी नियुक्ति सही नहीं होगी।

गौरतलब है कि NGO कॉमन कॉज ने कोर्ट में दाखिल याचिका में अस्थाना की नियुक्ति को समग्र अखंडता और संस्थानिक अखंडता के सिद्धांत के विपरीत बताया था। याचिका में नियुक्ति के रद्द करने और भ्रष्टाचार के मामले की जांच पूरी होने तक अस्थाना को सीबीआई से बाहर ट्रांसफर की मांग की गई थी।

याचिका में कहा गया था कि दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टाब्लिशमेंट एक्ट, 1946 के तहत स्पेशल डायरेक्टर की नियुक्ति के लिए केंद्र सरकार को  सीबीआई निदेशक के परामर्श पर  केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (CVC), सतर्कता आयुक्त ( VC), गृह सचिव और सचिव ( कार्मिक) की सिफारिशों के आधार पर नियुक्ति करनी है।

याचिका में दावा किया गया था कि सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने ये कहते हुए नियुक्ति का विरोध किया था कि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के एक मामले की जांच चल रही है। ये जांच गुजरात की स्टर्लिंग बॉयोटेक और मुंबई, वडोदरा व ऊटी की संदेसारा ग्रुप ऑफ कंपनीज से मिली एक डायरी के आधार पर चल रही है। डायरी में अस्थाना का नाम आया है कि उन्होंने कंपनियों से घूस ली है।

याचिका में कहा गया कि सीबीआई निदेशक की आपत्ति के बावजूद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की कैबिनेट कमेटी ने अगले ही दिन अस्थाना की नियुक्ति के आदेश दे दिए।

याचिका में द पायोनियर में जाने माने पत्रकार जे गोपालकृष्ण के आर्टिकल का हवाला दिया गया जिसमें लिखा है कि आपत्ति का कारण अखंडता का क्लॉज था। इसमें द हिंदू में छपे समाचार का हवाला दिया गया जिसमें सेलेक्ट कमेटी के एक सदस्य की ओर से कहा गया कि शनिवार को बैठक के दौरान सदस्य अस्थाना की पदोन्नति को लेकर विभाजित थे। इसलिए निर्णय लिया गया कि सोमवार को दोबारा बैठत होगी।

हालांकि एक संवाददाता सम्मेलन में CVC के वी चौधरी ने इसका खंडन करते हुए कहा था कि अस्थाना की नियुक्ति का फैसला सर्वसम्मति से लिया गया। उन्होंने ये भी कहा कि सीबीआई डायरेक्टर सेलेक्ट कमेटी के सदस्य नहीं हैं बल्कि सिर्फ उनकी राय ली जाती है।

याचिका में कहा गया कि सीबीआई डायरेक्टर की राय को अनदेख किया गया और ये भी साफ  नहीं है कि सलेक्शन कमेटी में नियुक्ति को लेकर क्या हुआ। साथ ही क्या ये नियुक्ति सेक्शन 4C के तहत 21 अक्तूबर 2017 को सिफारिशों के तहत हुई। साफ है कि इस मामले में सीबीआई डायरेक्टर के परामर्श को अनदेखा किया गया जो नियमों के खिलाफ है और ये कई फैसलों में कहा गया है।

इस नियुक्ति को अवैध बताते हुए कहा गया है कि बिना ठोस कारण बताए हुए सीबीआई डायरेक्टर के परामर्श को अनदेखा कर की गई ये नियुक्ति अवैध है। चूंकि अस्थाना सीबीआई डायरेक्टर के अधीन सीबीआई में काम करते रहे हैं इसलिए वो उनके मामले का सही मूल्यांकन कर सकते हैं। इसलिए बिना पर्याप्त कारण उनकी राय को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

याचिका में कहा गया है कि अस्थाना ने 2016 में सीबीआई के लिए जरूरी अपनी संपत्ति का रिटर्न भी दाखिल नहीं किया। याचिका में इस नियुक्ति को अवैध, बदनीयती से लिया गया फैसला और कोर्ट द्वारा तय किए गए अखंडता के सिद्धांत के खिलाफ है। साथ ही कानून का राज्य स्थापित करने के सिद्धांत के तहत ये नागरिकों के अनुच्छेद 14 और 21 के अधिकारों का उल्लंघन है।