यौन हमले के मामले में दर्ज प्राथमिकी को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता [दिशानिर्देश पढ़ें]

यौन हमले के मामले में दर्ज प्राथमिकी को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता [दिशानिर्देश पढ़ें]

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बलात्कार के पीड़ितों की पहचान को सुरक्षित करने के लिए महत्त्वपूर्ण निर्देश जारी किए।

न्यायमूर्ति एमबी लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने इस बारे में  9 दिशा निर्देश जारी किए हैं जो इस तरह से हैं -




  • कोई भी व्यक्ति प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, सोशल मीडिया आदि में पीड़ित के नाम को उजागर नहीं करेगा या घुमा फिराकर भी इस तरह से कुछ नहीं कहेगा जिससे पीड़ित की पहचान के बारे में पता चले और लोगों को इनके बारे में पता चल जाए।

  • ऐसी स्थिति में जब पीड़ित की मौत हो गई है या उसकी मानसिक दशा ठीक नहीं है, तो अगर पीड़ित के निकट संबंधी अगर इसकी इजाज़त देते हैं तो भी उस स्थिति में भी उसकी पहचान नहीं की जानी चाहिए बशर्ते कि उसकी पहचान को ज़रूरी बताने वाली परिस्थितियां मौजूद हों और इसके बारे में भी निर्णय उचित अधिकारी ही ले सकता है और यह अधिकारी है सत्र न्यायाधीश।

  • आईपीसी की धारा 376, 376A, 376AB, 376B, 376C, 376D, 376DA, 376DB or 376E of 39 के तहत दर्ज एफआईआर हों या POCSO के अधीन, इसे आम जानकारी में नहीं लाया जाएगा।

  • अगर कोई पीड़ित सीआरपीसी की धारा 372 के तहत मामला दायर करती है तो पीड़ित के लिए अपनी पहचान बताना ज़रूरी नहीं होगा और इस अपील पर क़ानून के अनुरूप कार्रवाई होगी।

  • वे सारे दस्तावेज़, जिसमें पीड़ित की पहचान बताई गई है, बेहतर है कि पुलिस को उन्हें एक सील कवर में रखनी चाहिए और इन दस्तावेज़ों की तरह ही दस्तावेज़ पेश करनी चाहिए लेकिन इसमें से वे सारी सूचनाएँ निकाल देनी चाहिए जिसके बारे में आम जीवन में लोग जाँच परख कर सकते हैं।

  • ऐसे सभी अथॉरिटीज़ जिनके समक्ष जाँच एजेंसी या कोर्ट ने पीड़ित की पहचान ज़ाहिर की है उनकी भी यह ज़िम्मेदारी है कि वे उसकी पहचान उस रिपोर्ट को छोड़कर और कहीं ज़ाहिर नहीं करें जिसे सिर्फ़ सील कवर में जाँच एजेंसी या कोर्ट को भेजी जाएगी।

  • पीड़ित के निकटतम संबंधी आवेदन द्वारा ऐसे पीड़ित जिसकी मौत हो गई है या जिसकी मानसिक दशा ठीक नहीं है, की पहचान आईपीसी की धारा 228A(2)(c) के तहत सिर्फ़ तब तक के लिए संबंधित सत्र न्यायाधीश के समक्ष ही हो सकती है जबतक कि सरकार धारा 228A(1)(c) के तहत इस बारे में हमारे निर्देशों के अनुरूप समाज कल्याण संस्थान या संगठन की पहचान के लिए कोई प्रक्रिया निर्धारित नहीं करती है।

  • अगर पीड़ित POCSO के तहत नाबालिग़ है, तो उसकी पहचान के बारे में किसी भी घोषणा की अनुमति सिर्फ़ विशेष अदालत ही दे सकता है अगर उसको लगता है कि इस तरह की जानकारी इस बच्चे के हित में होगा।

  • सभी राज्य/केंद्र शासित प्रदेश से आग्रह किया जाता है कि वे अपने-अपने राज्य के हर जिले आज से एक साल के भीतर कम से कम एक ‘वन स्टॉप सेंटर’ खोलना चाहिए।


पीठ के लिए इस फ़ैसले को न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता ने लिखा। इस मामले पर जनहित याचिका निपुन सक्सेना ने दायर किया था जिसका निस्तारन पीठ ने किया।

न्यायमूर्ति गुप्ता ने इस मुद्दे से दो हिस्सों में निपटा है। पहले हिस्से में बलात्कार के अपराध के पीड़ितों पर ग़ौर किया है दूसरे हिस्से में ऐसे पीड़ितों पर ग़ौर किया है जो बाल और यौन अपराध संरक्षण (पीओसीएसओ) अधिनियम, 2012 के तहत  पीड़ित हैं।

जब पीड़ितों को यह एहसास दिलाया जाता है कि दोष उनका ही है

जजों ने कहा कि बलात्कार पीड़ितों को अमूमन बलात्कार का पीड़ित को ‘अछूत’ माना जाता है और इसके लिए उन्होंने कई उदाहरण दिए।

बलात्कार के पीड़ितों को जिस तरह से अदालत के प्रतिकूल वातावरण का सामना करना पड़ता है उसको देखते हुए पीठ ने कहा कि अभियोजन को बलात्कार की पीड़ित महिला के साथ सभ्यता और सम्मान से पेश आना चाहिए।

मीडिया में जो भी ख़बर छपती है उसें पीडिता की पहचान किसी भी तरीक़े से ज़ाहिर नहीं किए जाएँ

पीठ ने कहा कि ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ पीड़ित के नाम का ख़ुलासा नहीं किया जाए बल्कि मीडिया में छपी ख़बर में पीड़ित की पहचान का संकेत देने जैसी कोई भी बात नहीं हो।

कोर्ट ने मीडिया की एक रिपोर्ट का ज़िक्र किया जिसमें यद्यपि पीडिता का नाम नहीं बताया गया था पर यह कहा गया था कि वह राज्य बोर्ड की परीक्षा में अव्वल रही है। इस स्थिति में उसकी पहचान का पता करना बहुत मुश्किल काम नहीं है। अनुमति के बिना पीड़िता का नाम ज़ाहिर नहीं किया जा सकता

 कोर्ट ने इस बात को भी स्पष्ट किया कि अगर पीड़िता की निकट संबंधी नाम ज़ाहिर करने की अनुमति देते हैं तो उस परिस्थिति में क्या किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि आम लोगों की उत्सुकता को बढ़ाने के लिए पीड़िता का नाम ज़ाहिर नहीं किया जा सकता और अगर किसी पीड़िता की पहचान को सुरक्षित रखने के लिए कोई अभियान चलाया जाता है तो ऐसा पीड़िता का नाम नहीं बताकर भी किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि अभी तक केंद्र या राज्य सरकारों ने ऐसे सामाजिक कल्याण संस्था या संगठन को नामित नहीं किया है जिसको पीड़िता के सगे-संबंधी इस बारे में ऑथरायज़ कर सकें।

कोर्ट ने कहा कि यह देखना सब का कर्तव्य है कि कोर्ट के अंदर जो होता है उसे बाहर नहीं बताया जाए। इसका मतलब यह नहीं है कि मामले की रिपोर्टिंग नहीं हो। प्रेस यह लिख सकता है कि मामले की सुनवाई हुई और गवाहियों की पड़ताल की गई। प्रेस यह भी लिख सकता है कि मामला क्या है और इस कोर्ट क्यों पहुँची है पर वह इस बात की रिपोर्ट नहीं कर सकता कि कोर्ट में क्या हुआ और पीड़िता और गवाहियों ने क्या कहा। साक्ष्य के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

पीठ ने कहा कि क्या किसी पीड़ित के लिए अपनी अपील या उनको बरी किए जाने के समय अपना नाम बताना ज़रूरी है कि नहीं। कोर्ट ने कहा कि ऐसे परिस्थितियों में पीड़िता छद्म नाम से अपना अपील दाख़िल कर सकती है। कोर्ट ने कहा, “…कोर्ट अपील के विवरणों पर ग़ौर करेगा पर जो दस्तावेज़ आम दायरे में दायर किए जाएँगे उसमें पीडिता का नाम नहीं बताया जा सकता। इस तरह के दस्तावेज़ों की सुनवाई कोर्ट कमरे में करेगा और इस मामले के निस्तारन तक ‘cause list’ में भी पीड़िता के नाम का ज़िक्र नहीं किया जाएगा। सार्वजनिक दायरे में रखे जाने वाले किसी भी दस्तावेज़ में पीड़िता के नाम या उसकी पहचान नहीं बताई जा सकती।”