अगर क़ानून में प्रावधान हो तो सरकारी अथॉरिटी निजी एककों से सूचना प्राप्त करने और उसे आरटीआई आवेदनकर्ता के साथ साझा करने के लिए दायित्वों से बँधे हैं : दिल्ली हाईकोर्ट [निर्णय पढ़ें]

अगर क़ानून में प्रावधान हो तो सरकारी अथॉरिटी निजी एककों से सूचना प्राप्त करने और उसे आरटीआई आवेदनकर्ता के साथ साझा करने के लिए दायित्वों से बँधे हैं : दिल्ली हाईकोर्ट [निर्णय पढ़ें]

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि अगर किसी सरकारी अथॉरिटी को अधिकार है और अगर वह किसी क़ानून के तहत किसी निजी एकक से क़ानूनन सूचना प्राप्त कर सकता है तो उसे आरटीआई अधिनियम की धारा 2 (f) के तहत सूचना माना जाएगा और वह इसे आरटीआई आवेदनकर्ता के साथ इसको साझा कर सकता है।

न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत के सामने प्रश्न यह था कि अगर कोई सेवा प्रदाता यह कहते हुए सूचना देने से इंकार कर दे कि वह सार्वजनिक अथॉरिटी नहीं है और इसलिए वह सूचना का अधिकार अधिनिय, 2005 के तहत नहीं आता तो क्या उस स्थिति में टीआरएआई (ट्राई - दूर संचार नियामक प्राधिकरण) जो इन  सेवाओं का विनियमन करता है क्या उपयुक्त प्राधिकरण है?

न्यायमूर्ति कैत ने कहा, “…अगर किसी सार्वजनिक प्राधिकरण को यह अधिकार है कि वह किसी निजी एकक से सूचना प्राप्त कर सकता है तो सूचना का अधिकार के तहत यह ‘सूचना’ है और इस सूचना को आरटीआई आवेदक के साथ साझा करने के लिए वह क़ानून के तहत दायित्वों से बंधा है।”

 यह कहते हुए कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) द्वारा 12 सितम्बर 2018 को दिए गए आदेश के ख़िलाफ़ ट्राई की अपील को निरस्त कर दिया। सीआईसी ने आवेदक कबीर शंकर बोस द्वारा अपने पंजीकृत मोबाइल के बारे में माँगी गई सूचना उपलब्ध कराने का आदेश ट्राई को दिया था।

सुप्रीम कोर्ट में वक़ील, बोस ने वोडाफ़ोन से यह जानना चाहा था कि क्या उसके मोबाइल फ़ोन के नंबर की निगरानी हो रही है और अगर हाँ, तो किसके कहने पर और कौन सी एजेंसी उसके फ़ोन की ट्रैकिंग और ट्रैपिंग कर रही है।

वोडाफ़ोन ने उन्हें जानकारी देने से मना कर दिया यह कहते हुए वह आरटीआई अधिनियम के तहत कोई सार्वजनिक इकाई नहीं है।

इसके बाद बोस ने सीआईसी में अपील की और उसने ट्राई को यह जानकारी देने को कहा।

ट्राई ने हाईकोर्ट में कहा की जो जानकारी माँगी गई है वह ट्राई के रेकर्ड में नहीं है और इसलिए वह यह देने के लिए बाध्य नहीं है। उसने यह भी कहा कि आरटीआई अधिनियम के तहत वह यह सूचना जुटाने और इसे आवेदक को देने के लिए बाध्य नहीं है।

न्यायमूर्ति कैत ने कहा, “ट्राई अधिनियम 1997 के तहत याचिकाकर्ता को किसी भी तरह की सूचना प्राप्त करने और जाँचक करने का अधिकार है…यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता को किसी निजी एकक जैसे वोडाफ़ोन इंडिया से कोई भी सूचना माँगने का अधिकार नहीं है। यह सर्वमानय तथ्य है की याचिकाकर्ता भारत में इस सेवा का विनियामक है।”