संवैधानिक अदालत होने के कारण हाइकोर्टों को अपने ही आदेश को वापस लेने का अधिकार है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

संवैधानिक अदालत होने के कारण हाइकोर्टों को अपने ही आदेश को वापस लेने का अधिकार है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट के  ‘court of record’ होने के कारण उसे अपने ही आदेश को वापस लेने का अधिकार ख़ुद ब ख़ुद मिला हुआ है।

म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ़ ग्रेटर मुंबई बनाम प्रतिभा इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश को वापस लेने के हाइकोर्ट के अधिकार पर विचार किया।

बॉम्बे हाईकोर्ट की एकल पीठ ने शुरू में एक मध्यस्थ की नियुक्ति का आदेश दिया था। बाद में जज को इस बात का भान हुआ कि समझौते में मध्यस्थता का प्रावधान नहीं है और उसने इस आदेश को वापस ले लिया। अन्य पक्ष ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ यह कहते हुए अपील की कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम के प्रथम भाग में चूँकि इस तरह का प्रावधान नहि है, किसी भी अदालत को अपने ही आदेश को वापस लेने के बारे में एकल जज के समक्ष दायर पुनर्विचार याचिका  की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

इसके बाद कॉर्पोरेशन ने खंडपीठ के आदेश के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की और कहा कि हाईकोर्ट के पास यह अधिकार ख़ुद ब ख़ुद है क्योंकि वह ‘court of record’ है। प्रतिपक्ष के वक़ील का कहना था कि मध्यस्थता अधिनियम अपने आप में एक संहिता है और इस वजह से पुनर्विचार के अधिकार के लिए इस क़ानून के बाहर देखने की ज़रूरत नहीं है।

न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन और न्यायमूर्ति एमआर शाह की पीठ ने खंडपीठ के फ़ैसले से संतुष्ठ नहीं थे और कहा की हाईकोर्ट चूँकि ‘court of record’ है इसलिए उसे अपने ही आदेश को वापस लेने का अधिकार ख़ुद ब ख़ुद मिला है। सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों में इस बात की तस्दीक़ की जा चुकी है।

कोर्ट ने National Sewing Thread Co. Ltd. v. James Chadwick & Bros., Shivdev Singh & Ors. v. State of Punjab और M.M. Thomas v. State of Kerala मामलों में इस बारे में आए फ़ैसलों का  ज़िक्र किया।