अदालत में फ़र्ज़ी ऑडीओ क्लिप चलाकर जज को बदनाम करने वाले वक़ील को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लताड़ [आर्डर पढ़े]

अदालत में फ़र्ज़ी ऑडीओ क्लिप चलाकर जज को बदनाम करने वाले वक़ील को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लताड़ [आर्डर पढ़े]

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को एक वक़ील रंजना अग्निहोत्री को आड़े हाथों लिया। कोर्ट ने कहा कि वक़ील मामले की सुनवाई कर रही पीठ के जजों का मज़ाक़ उड़ा रही हैं और उनका अपमान कर रही हैं।

वक़ील ने उस समय एक ऑडीओ क्लिप चलाया जब पीठ ने इस वक़ील के पिता द्वारा दायर याचिका को निरस्त कर दिया। इस ऑडीओ क्लिप में पीठ के एक जज विक्रम नाथ पर भ्रष्ट होने का आरोप लगाया गया था।

न्यायमूर्ति नाथ और न्यायमूर्ति  राजेश सिंह चौहान की पीठ ने कहा, “वह एक वक़ील हैं और इस वजह से न्यायिक प्रणाली का हिस्सा भी। इसके बावजूद वह अपने व्यवहार के परिणामों के बारे में जानती नहीं हैं और पीठ एक एक जज को अपमानित करने पर तुली हैं। उन्हें 22 साल का अनुभव है इसके बावजूद वह इस पीठ से जिसने उनके ख़िलाफ़ इस मामले में विपरीत टिप्पणी की है, अपना काम कराने के लिए ये हथकंडे अपनाने से बाज़ नहीं का रही हैं।”

कोर्ट ने कहा कि यह एक ऐसा मामला है जिसमें इस वक़ील के ख़िलाफ़ आपराधिक मानहानि की कार्रवाई की जा सकती है। हालाँकि पीठ ने ऐसा नहीं किया क्योंकि वरिष्ठ वकीलों ने बीच बचाव किया।

इसके बावजूद, पीठ ने रजिस्ट्री को अपने आदेश में कहा कि वह इस फ़ैसले की प्रति ओऊध बार असोसीएशन, यूपी बार काउन्सिल के अध्यक्ष को कार्रवाई के लिए भेजे और इलाहाबाद के रजिस्ट्रार जनरल और वरिष्ठ रजिस्ट्रार, लखनऊ को भी भेजा और उन्हें एडवोकेट ऑन रॉल से निपटने वाली समिति के समक्ष उचित कार्रवाई के लिए रखे।

यह मामला लखनऊ में एक ज़मीन से जुड़ा है और यह मामला राजेंद्र कांत अग्निहोत्री ने दायर किया था जो रंजना अग्निहोत्री के पिता हैं।

ऐसी शिकायत थी कि यह ज़मीन ग्राम सभा की है और अग्निहोत्री ने इसे फ़र्ज़ी तरीक़े से इसे अपने नाम करा लिया था इसलिए तहसीलदार राजेश कुमार शुक्ला ने इसकी जाँच शुरू की। शुक्ला की जाँच में या आशंका सही पाई गई।

अग्निहोत्री ने हाईकोर्ट के लखनऊ पीठ में याचिका दायर की और इस रिपोर्ट को निरस्त करने की माँग की।

इस याचिका पर अप्रैल 2008 में सुनवाई की गई और फ़ैसले तक आने में इसमें आठ साल लग गए।मई 2017  में शुक्ला ने इस मामले को इलाहाबाद स्थानांतरित करने की माँग की गई।

इस साल इस मामले की जब इस वर्ष 14 अगस्त को जब सुनवाई हो रही थी, श्रीमती अग्निहोत्री बार-बार उठ रही थी और कोर्ट ने उन्हें अपनी बात कहने की इजाज़त दे दी। वह अनुमति पाने पर अपने मोबाइल पर एक ऑडीओ क्लिप चलाईं जो अग्निहोत्री को एक वक़ील राहुल श्रीवास्तव सुना रहे थे और जो शुक्ला और एक अन्य वक़ील दिग्विजय नाथ दूबे के बीच हुई बातचीत के बारे में था।

श्रीवास्तव ने इन्हें कहा कि शुक्ला ने दावा किया है कि न्यायमूर्ति नाथ को मिला लिया गया है। इसको सुनने के बाद कोर्ट ने अग्निहोत्री को इस ऑडीओ क्लिप की ट्रान्स्क्रिप्ट सौंपने को कहा ताकि सीबीआई की जाँच के लिए उपयुक्त आदेश दिया जा सके।

पर अग्निहोत्री सीबीआई जाँच के लिए राज़ी नहीं हुईं पर यह कहा कि यह पीठ इस मामले की सुनवाई नहीं करे।

कोर्ट ने श्रीमती अग्निहोत्री और वरिष्ठ एडवोकेट और एल्डर्ज़ कमिटी के अध्यक्ष और प्रेज़िडेंट एवं ओऊध बार एसोसीशन और लखनऊ पीठ के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में इस ऑडीओ क्लिप को दुबारा चलाने को कहा। पर उन्होंने बहाने बनाकर ऐसा करने से मना कर दिया और उन्हें उस समय चैम्बर में हो रही वार्तालाप को रेकर्ड करते हुए भी पाया गया। हालाँकि, उन्होंने बिना शर्त माफ़ी उस समय माँगी पर अदाल सकते में था।

कोर्ट ने अपने आदेश में इस घटना का ज़िक्र करते हुए कहा, “यह एक ऐसा मामला है जिसमें एक विवेकहीन मुक़दमादार  जोकि ख़ुद एक एडवोकेट है, इस बात का पूरा प्रयास किया है कि इस मामले की सुनवाई यह पीठ जिसने इस याचिका को सुनवाई के योग्य नहीं माना है, नहीं करे और और किसी अन्य अदालत में इस मामले की सुनवाई हो जहाँ वह अपने मनोनुकूल आदेश प्राप्त कर सके या फिर इस ताक में लगी रहे की माहौल कब उनके अनुकूल होता है। याचिकाकर्ताओं को पिछले दस सालों से अंतरिम आदेश मिलता जा रहा है और उनकी पूरी कोशिश किसी भी तरह मामले को लंबित रखने की है।”

अंत में पीठ ने कहा कि उनके समक्ष यह दुविधा है कि वह इस मामले की सुनवाई करें या फिर इसको किसी अन्य अदालत में जानें दें।

हालाँकि, कोर्ट ने इस मामले जाने दिया लेकिन इससे पहले मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया कि वह सभी आवेदनों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरित करने पर ग़ौर करें। ऐसा करते हुए पीठ ने यह दृढ़ विश्वास जताया कि जजों के ख़िलाफ़ इसी तरह का हथकंडा फिर अपनाया जा सकता है।