सेवा नियमों का उल्लंघन कर अधिकारी को ‘ऊंची छलांग’ वाली पदोन्नति की अनुमति देने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त किया [निर्णय पढ़ें]

सेवा नियमों का उल्लंघन कर अधिकारी को ‘ऊंची छलांग’ वाली पदोन्नति की अनुमति देने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त किया [निर्णय पढ़ें]

जो हुआ उसे नियमसम्मत नहीं कहा जा सकता है। यह स्पष्ट रूप से पक्षपात का मामला था। '

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को असम के पूर्व मुख्यमंत्री के साथ काम करने वाले एक अधिकारी को ऊंची छलांग वाले प्रोमोशन की अनुमति देने को सेवा शर्तों का उल्लंघन बताया।

न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने गौहाटी उच्च न्यायालय के एकल पीठ के फैसले को बहाल कर दिया जिसे पहले खंडपीठ ने देरी के आधार पर निरस्त कर दिया था। खंडपीठ ने यह भी स्वीकार किया था कि 13 रिक्तियों का कोई अस्तित्व नहीं था और देबजीत दास पर कृपा की गई थी।

खंडपीठ  के दृष्टिकोण से असहमति जताते हुए अदालत ने कहा कि धोखाधड़ी हर कार्रवाई का रंग बिगाड़ देती है और इसे इस आधार पर दबाकर नहीं रखा जा सकता कि इसे देर से चुनौती दी गई खासकर तब जब विलंब के लिए उचित स्पष्टीकरण मौजूद हैं।

तथ्यों पर गौर करने के बाद  पीठ ने इसे  धोखाधड़ी का मामला बताया और कहा : “सबसे पहलेसिर्फ प्रतिवादी नंबर 1 के लिए कैडर के बाहर कार्यपालक अभियंता का पद सृजित करना और उसको यह पद देना जबकि वह कईयों से कनिष्ठ है। फिर उसको प्रतिवादी नंबर 1 को कार्यपालक अभियंता के  कैडर में जगह देना।  ऐसा स्पष्ट रूप से उसे समायोजित करने के लिए किया गया था। तीसरा, उसे पदोन्नति भी दी गई जबकि प्रतिवादी संख्या 1 नियमों के अनुसार इस पद के योग्य भी नहीं था और नियम के अनुसार उसने न्यूनतम पांच वर्ष की सेवा भी पूरी नहीं की थी”।

पीठ ने उच्च न्यायालय की खंडपीठ के इस विचार से सहमत था कि यह पूरा मामला प्रामाणिक गड़बड़ी है। जो हुआ उसे उचित नहीं कहा जा सकता है। यह स्पष्ट रूप से प्रतिवादी संख्या 1 को दिखाया गया पक्षपात था और यह कार्य नियमों के विपरीत है

यह ध्यान रखना होगा कि यह व्यक्ति उस समय मुख्यमंत्री के साथ उनके विशेष कर्तव्य अधिकारी के रूप में काम कर रहा था। ये तथ्य यह बताते हैं कि विभिन्न स्तरों पर व्यवस्था का नाजायज फायदा उठाया गया है ताकि प्रतिवादी संख्या 1 को बारी के बाहर पदोन्नति दिया जा सके और उस पर ऐसी कृपा की जा सके जिसका वह हकदार नहीं है। इस तरह के फ्लाईओवर प्रोमोशन’ के साथप्रतिवादी संख्या 1 कई सारे अपने से वरिष्ठ अधिकारियों को पीछे छोड़ता हुआ सहायक कार्यपालक अभियंता से अधीक्षण अभियंता बन गया जबकि उससे कई वरिष्ठ अधिकारी अभी तक सहायक कार्यपालक अभियंता के कैडर में ही हैं।

अदालत ने कहा कि विलंब इसलिए हुआ क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री को इस बारे में प्रतिवेदन दिया गया था।