सुप्रीम कोर्ट ने J&K में प्रभारी डीजीपी की नियुक्ति पर दखल देने से इनकार किया, AG की सहायता मांगी

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जम्मू-कश्मीर सरकार के  उस कदम पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया जिसमें डीजी जेल दिलबाग सिंह को एसपी वैद्य की जगह प्रभारी पुलिस महानिरीक्षक (डीजीपी) के रूप में नियुक्त किया गया है।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चन्द्रचूड़  की पीठ  ने इस मामले में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल की सहायता मांगी है।

वहीं सुनवाई के दौरान जम्मू-कश्मीर सरकार ने “उभरती परिस्थितियों” का हवाला दिया और शीर्ष न्यायालय की पूर्व दिशानिर्देश के संदर्भ में ” कार्यकारी डीजीपी” की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के लिए आग्रह किया।

  जम्मू-कश्मीर के लिए उपस्थित वकील शोएब आलम ने बेंच को बताया कि यूपीएससी के परामर्श से नियमित नियुक्ति होने तक प्रभारी डीजीपी की नियुक्ति पूरी तरह से असाधारण स्थिति को पार करने के लिए एक अंतरिम उपाय है। उन्होंने कहा कि प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और अंतरिम डीजीपी की व्यवस्था नियमित नियुक्ति होने तक जारी रहेगी।

केंद्र के लिए उपस्थित अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के पहले फैसले में दिए गए दो साल के निर्धारित कार्यकाल के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक्टिंग डीजीपी की नियुक्ति पर प्रतिबंध लगाया गया था। उन्होंने कहा कि केंद्र जम्मू-कश्मीर के आवेदन पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करेगा।

मूल याचिकाकर्ता प्रकाश सिंह के लिए पेश वकील प्रशांत भूषण ने इस तरह की नियुक्ति का विरोध किया और तर्क दिया कि यह अदालत की अवमानना ​​है। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि इस तरह की नियुक्ति पर रोक लगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वह भी राज्य के आवेदन पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करेंगे।

गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर में प्रभारी डीजीपी की नियुक्ति को लेकर राज्य की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर तीन जुलाई के उस आदेश में संशोधन करने की मांग की गई है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी भी राज्य में कार्यकारी पुलिस महानिदेशक ( डीजीपी)  नियुक्त नहीं होंगे।

शुक्रवार को सुबह राज्य की ओर से पेश वकील शोएब आलम ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को बताया था कि राज्य के डीजीपी एस पी वैद्य का तबादला किया गया है। लेकिन राज्य के विशेष हालात, कानून व्यवस्था और आतंकवाद को देखते हुए राज्य पुलिस के डीजीपी के पद को कभी भी रिक्त नहीं रखा जा सकता। इसलिए सरकार की ओर से चीफ सेकेट्री ने डीजी ( जेल) दिलबाग सिंह को डीजीपी का प्रभार सौंपा है।

अर्जी में ये भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक UPSC को वरिष्ठ IPS अफसरों की सूची भेजी गई है लेकिन नियुक्ति में समय लगेगा। ऐसे में ये नियुक्ति अस्थाई तौर पर स्थाई डीजीपी नियुक्त होने तक की गई है।

गौरतलब है कि तीन जुलाई को देशभर में पुलिस सुधार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों को आदेश दिया था कि वो कहीं भी कार्यकारी पुलिस महानिदेशक ( डीजीपी)  नियुक्त नहीं करेंगे।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए  कहा था कि कार्यकारी डीजीपी नियुक्त करना सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा है कि राज्य डीजीपी का पद रिक्त होने से तीन महीने पहले UPSC को वरिष्ठ IPS अफसरों की सूची भेजेंगे और राज्य उसी अफसर को DGP बनाएंगे जिसका कार्यकाल दो साल से ज्यादा होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य कोर्ट के आदेशों का दुरुपयोग कर रहे हैं।

दरअसल केंद्र सरकार की ओर से पेश अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने पीठ को बताया था कि ज्यादातर राज्य रिटायर होने की कगार पर पहुंचे अफसरों को कार्यकारी डीजीपी नियुक्त करते हैं।फिर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देकर नियमित डीजीपी बना देते हैं क्योंकि इससे अफसर को दो साल और मिल जाते हैं।

वेणुगोपाल ने कहा कि सिर्फ पांच राज्य तमिलनाडु, आंध्रा, राजस्थान, तेलंगाना और कर्नाटक ने ही 2006 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक DGP की नियुक्ति के लिए UPSC से अनुमति ली है जबकि 25 राज्यों ने ये नहीं किया। राज्य सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का मिसयूज कर रहे हैं इसलिए सुप्रीम कोर्ट को अपने आदेशों में संशोधन करना चाहिए।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट पुलिस सुधार पर दिए गए आदेश लागू नहीं करने पर दायर की गई अवमानना याचिका की सुनवाई कर रहा था।

याचिका में कहा गया कि साल 2006 में पुलिस सुधार पर दिए गए अदालत के आदेश को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अभी तक लागू नहीं किया है।अदालत ने डीजीपी और एसपी का कार्यकाल तय करने जैसे कदम उठाने की सिफारिश की थी।

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