भीमा- कोरेगांव हिंसा: महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, गिरफ्तारी असहमति नहीं बल्कि पुख्ता सबूतों की वजह से [शपथ पत्र पढ़ें]

भीमा- कोरेगांव हिंसा: महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, गिरफ्तारी असहमति नहीं बल्कि पुख्ता सबूतों की वजह से [शपथ पत्र पढ़ें]

भीमा- कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में नक्सल से जुडे होने के आरोप में पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के मामले में महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा है कि ये याचिका सुनवाई योग्य नही है और याचिकाकर्ताओं का आरोपियों से कोई लेना-देना नहीं है।

वकील निशांत कातनेश्वरकर के माध्यम से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि आरोपियों को मतभेद सोच या विचारों से असहमति की वजह से गिरफ्तार नहीं किया गया है बल्कि आपराधिक मामले की जांच और भरोसेमंद सबूतों के आधार पर कार्रवाई की गई है।

महाराष्ट्र सरकार ने कहा है कि गिरफ्तार किए गए पांचों मानवाधिकार कार्यकर्ता समाज मे अशांति फैलाने की योजना बना रहे थे।  इस बात के सबूत पुलिस को मिले हैं कि पांचों प्रतिबंधित माओवादी संगठन के सदस्य हैं। इनके पास से आपत्तिजनक सामग्री भी बरामद की गई है।

पुलिस इन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ करना चाहती है।साथ ही इनमें से कुछ का आपराधिक इतिहास भी रहा है।  सुप्रीम कोर्ट को इस मामले की सुनवाई गुरुवार 6 सितंबर को करनी है।

गौरतलब है कि 29 अगस्त को भीमा- कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में नक्सल से जुडे होने के आरोप में पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दखल देते हुए उन्हें 6 सितंबर तक उनके घरों में ही हाउस अरेस्ट रखने के आदेश जारी किए।

 देर शाम चली सुनवाई में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने केंद्र और महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब भी मांगा था।

सुनवाई के दौरान उस वक्त सुप्रीम कोर्ट नाराज हुआ जब महाराष्ट्र सरकार के वकील ने कहा कि ये आरोपी नहीं हैं ये तीसरा पक्ष हैं। ये याचिका तो सुनवाई योग्य ही नहीं है। इस पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि ये दलील बकवास है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि असहमति की आवाज़ लोकतंत्र का प्रेशर वाल्व है। अगर आप इसे दबाएंगे तो प्रैशर कुकर फट जाएगा।

वहीं महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश ASG तुषार मेहता ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ सबूत हैं उनके माओवादियों से लिंक पाए गए हैं।

इसके अलावा याचिकाकर्ता आरोपी नहीं हैं।

वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि कल देशभर में गिरफ्तारियां हुईं। FIR मराठी में थी। 2017 की मीटिंग में ये लोग मौजूद नहीं थे। FIR में नाम नहीं था। इनकी गिरफ्तारी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।याचिकाकर्ता की तरफ से कहा कि दो आरोपियों की तरफ से हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की गई है।

दरअसल इसी साल जनवरी में हुई भीमा- कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में नक्सल से जुडे होने के आरोप में पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं  की गिरफ्तारी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर बुधवार को ही 3.45 बजे मेंशन करने को कहा था।

ये याचिका रोमिला थापर, देवकी जैन, प्रभात पटनायक, सतीश देशपांडे और माया दारूवाला की ओर से दाखिल की गई है।

दाखिल याचिका में कहा गया है कि महाराष्ट्र पुलिस का ये कदम गैरकानूनी है। जब तक सुप्रीम कोर्ट मामले का निपटारा ना कर ले तब तक किसी भी गिरफ्तारी पर रोक लगे और  कोर्ट की निगरानी में जांच पूरी होने तक पांचों को रिहा किया जाए। साथ ही मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाए। याचिका में ये भी कहा गया है कि इस तरह ताबड़तोड़ गिरफ्तारी करने पर महाराष्ट्र सरकार से स्पष्टीकरण मांगने की गुहार भी लगाई गई है।

दरअसल  हैदराबाद में वामपंथी कार्यकर्ता और कवि वरवरा राव, मुंबई में कार्यकर्ता वेरनोन गोन्जाल्विस और अरुण फरेरा, छत्तीसगढ़ में ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज और दिल्ली में रहनेवाले गौतम नवलखा के घरों की तलाशी ली गई और उन्हें गिरफ्तार किया गया। गौतम के ट्रांजिट रिमांड पर दिल्ली हाईकोर्ट ने और सुधा भारद्वाज के ट्रांजिट रिमांड पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने रोक लगाई है।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में इसी वर्ष एक जनवरी को दलित समाज द्वारा एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था लेकिन मराठा और दलितों के बीच हिंसक झड़प हो गई। झड़प में एक व्यक्ति की मौत हुई थी,जिसके बाद पूरा महाराष्ट्र जातीय हिंसा की चपेट में आ गया था।

 पुलिस के मुताबिक छापेमारी में जो कागजात मिले हैं वो इस बात का सबूत है कि हिंसा में नक्सलियों के पैसे का इस्तेमाल किया गया था। पुलिस ने इन्हीं सबूतों के आधार पर पांच लोगों को गिरफ्तार किया था।