सुप्रीम कोर्ट ने उस व्यक्ति की सजा को सही ठहराया जिसके विवाहेत्तर संबंध के कारण उसकी पत्नी ने आत्महत्या की [निर्णय पढ़ें]

यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता का दूसरी महिला के साथ संबंध का कोई असर नहीं हुआ होगा कि आईपीसी की धारा 306 को नकारा जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यक्ति को अपनी पत्नी को हत्या के लिए उकसाने का दोषी मानते हुए उसको मिली सजा को सही ठहराया है। इस व्यक्ति का किसी अन्य महिला के साथ विवाहेत्तर संबंध थे।

कविता ने सिद्दालिंग के साथ शादी होने के चार महीने के अंदर ही आत्महत्या कर ली थी। अभियोजन के अनुसार इस आत्महत्या का कारण उसके पति की दहेज़ की मांग और किसी अन्य महिला के साथ उसके विवाहेत्तर संबंध को बताया गया।

अभियोजन पक्ष ने अदालत में एक दस्तावेज पेश किया जो पंचायत के साथ किया गया सिद्दालिंग का एक समझौता था जिसमें आरोपी ने स्वीकार किया था कि वह एक अन्य महिला के साथ रह रहा है और उसकी पत्नी ने उसे ऐसा करते हुए देखा है।

निचली अदालत ने सिद्दालिंग और उसके पिता को दहेज़ निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराया।

यद्यपि गिरीश अनंतमूर्ति, वकील ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का सन्दर्भ देते हुए कहा कि किसी को उकसाने के पीछे एक मानसिक प्रक्रिया काम करती है, सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायमूर्ति आर बनुमती और न्यायमूर्ति विनीत सरन की पीठ ने आरोपी को दी गई सजा में दखल देने से मना कर दिया।

पीठ ने कहा, “ गवाहियों ने अपने बयान में स्पष्ट कहा है कि याचिकाकर्ता का दूसरी महिला के साथ संबंध कायम रहा। याचिकाकर्ता के विवाहेत्तर संबंध ने निश्चित रूप से मृतक महिला को मानसिक रूप से असंतुलित किया होगा जिसकी वजह से वह इस तरह का कदम उठाने को उद्यत हुई। यह नहीं कहा जा सकता कि किसी अन्य महिला के साथ उसके विवाहेत्तर संबंध ने उसको आत्महत्या के लिए नहीं उकसाया होगा…”

पीठ ने याचिकाकर्ता की सजा को बदलने में भी किसी तरह का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

विरोधाभास

पर यह फैसला 2015 में दिए गए फैसले का प्रतिवाद करता है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ विवाहेत्तर संबंध का साक्ष्य होना क्रूरता नहीं कहा जा सकता।

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “अगर यह साबित भी हो जाए कि विवाहेत्तर संबंध गैरकानूनी और अनैतिक है, जैसे कि पिनाकिन महिपात्री रावल मामले में कहा गया है, पर अगर अभियोजन पक्ष सबूत के साथ यह साबित करता है कि आरोपी का व्यवहार ऐसा था जिसने उसकी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाया तो फिर यह एक अलग चरित्र अपना लेता है।”

पिनाकिन महिपात्री रावल मामले में न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन ने कहा था कि सिर्फ इस तथ्य की वजह से कि वैवाहिक संबंध के दौरान पति को कसी महिला से कोई घनिष्ठता है और वह अपना वैवाहिक दायित्व पूरा करने में विफल रहा, क्रूरता नहीं है, पर इसकी प्रकृति अवश्य ही ऐसी होनी चाहिए कि उसकी वजह से पत्नी आत्महत्या करने को बाध्य हुई और आईपीसी की धारा 498A के तहत यह मामला बनता है…”

प्रकाश बाबू बनाम कर्नाटक राज्य मामले में 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को दुहराया था कि विवाहेत्तर संबंध अपने आप में 498A के तहत नहीं आता। वह अनैतिक और गैरकानूनी हो सकता है पर इसके साथ ही अन्य बातों का होना जरूरी है ताकि इसे आपराधिक कार्य साबित किया जा सके।

पिनाकिन महिपात्रय रावल मामले में फैसला स्पष्ट है। आईपीसी की धारा 306 के तहत पति को सजा दिलाने के लिए अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि उसने पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाया, सिर्फ विवाहेत्तर संबंध का सबूत उसको सजा दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। न्यायमूर्ति बनुमती ने जो नवीनतम फैसला दिया है उसमें सारा जोर विवाहेत्तर संबंध के सबूतों पर है।

 

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