अंतर-अदालतीय अपील में एकल जज किसी खंडपीठ से नीचे नहीं होता, दोनों के क्षेत्राधिकार एक ही हैं : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

सिर्फ मुकदमादारों को असुविधा से बचाने के लिए, जहाँ तक हाईकोर्ट की शक्तियों की बात है, खंडपीठ स्क्रीनिंग का एक और स्तर उपलब्ध कराता है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि एकल जज खंडपीठ के नीचे होता है।

हाईकोर्ट द्वारा एक खंडपीठ का एकल जज को किसी राहत में संशोधन के लिए मामला सौंपने पर गंभीरता बरतते हुए  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एकल जज खंडपीठ के नीचे नहीं है।

किसी सर्विस मामले में एकल जज की पीठ ने आवेदनकर्ता को नियुक्ति और वरिष्ठता में जो राहत दी थी,  उसी से जुड़ी यह रिट याचिका थी जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट कर रहा था।  खंडपीठ ने राज्य लोक सेवा आयोग की रिट अपील पर सुनवाई में एकल जज की पीठ द्वारा दिए गए फैसले से सहमत नहीं था। इसलिए यह मामला दुबारा एकल पीठ को भेजा गया।

न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने रोमा सोनकर बनाब मध्य प्रदेश राज्य लोक सेवा आयोग मामले में कहा कि खंडपीठ को चाहिए कि वह मेरिट के हिसाब से अपील पर सुनवाई करे और एकल जज की पीठ का फैसला सही है कि नहीं इसकी जांच करे न कि मामले को दुबारा एकल जज की पीठ को सौंप दे।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, “हम इस बारे में गंभीर हैं कि क्या खंडपीठ को अंतर-अदालतीय अपील में क्या दिए गए राहत को दुबारा ठीक करने के लिए किसी रिट याचिका को एकल पीठ को भेजना चाहिए था। यह संविधान की धारा 226 के तहत हाईकोर्ट के क्षेत्राधिकार का प्रयोग है। एकल जज और खंड पीठ दोनों को ही वही क्षेत्राधिकार उपलब्ध हैं।”

पीठ ने आगा कहा कि सिर्फ मुकदमादारों को असुविधा से बचाने के लिए, जहाँ तक हाईकोर्ट की शक्तियों की बात है, खंडपीठ स्क्रीनिंग का एक और स्तर उपलब्ध कराता है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि एकल जज खंडपीठ के नीचे होता है।

“रिट की पर सुनवाई की प्रक्रिया होने के कारण अंतर-अदालातीय अपील में खंडपीठ को यह कार्य सौंपा गया था जिसका प्राथमिक उद्देश्य इस बात का निर्णय करना था कि एकल जज पीठ का निर्णय सही था या नहीं,” पीठ ने कहा।

 

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