अपराध-पीड़ित आरोपी का जमानत रद्द किये जाने की मांग कर सकता है : मध्य प्रदेश हाईकोर्ट [आर्डर पढ़े]

यह राज्य का दायित्व है कि वह आरोपी को क़ानून के हवाले करे लेकिन इस प्रक्रिया में अपराध के वास्तविक भुक्तभोगी को क़ानून के बाहर खड़े रहने और पूरी प्रक्रिया को पीछे से देखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महेश पहाड़े बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में कहा कि किसी अपराध के पीड़ित को जमानत को रद्द करने या सजा को निलंबित किये जाने की मांग करने का अधिकार है।

न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला ने एक आवेदन पर गौर करते हुए उक्त बातें कही। इस आवेदन में के आरोपी को निचली अदालत ने अपनी भतीजी के यौन शोषण के आरोप में सजा सुनाई थी और उसने इस सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने सजा को निलंबित करने के आरोपी के आवेदन को स्वीकार कर लिया। इसके बाद पीड़िता ने हाईकोर्ट में यह कहते हुए अपील की कि आरोपी को अतिरिक्त दस्तावेजों के आधार पर जमानत दी गई जब कि सजा को निलंबित करने के आवेदन पर  गौर करने के दौरान ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था और वह भी पीड़िता को आरोपों के बारे में जवाब देने का मौक़ा दिए बिना।

आरोपी-अपीलकर्ता के वकील ने कहा कि अगर पीड़िता को आरोपी को बरी करने के खिलाफ अपील दायर करने का अधिकार दिया भी गया तो भी वह जमानत को रद्द किए जाने की मांग करने का अधिकारी नहीं हो जाती है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना राज्य और आंध्र प्रदेश राज्य के लिए हैदराबाद हाईकोर्ट जुडिकेचर बनाम महाबुनिसा बेगम एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र किया। यह भी कहा गया कि सिर्फ लोक अभियोजक ही जमानत रद्द करने का आवेदन दायर कर सकता है।

अगर इस तरह के जघन्य अपराधों के पीड़ितों को कोर्ट के समक्ष अपनी शिकायतों के निपटारे का मौक़ा नहीं दिया गया तो यह न्याय का मजाक उड़ाना होगा, पीठ ने कहा।

पीठ ने पूरण बनाम रामबिलास मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला भी दिया जो कि जमानत को रद्द किए जाने से संबंधित था। कोर्ट ने कहा, “उपरोक्त फैसला जो कि संहिता की धारा 372 में हुए संशोधन से पहले का है जिसके द्वारा पीड़ित को यह अधिकार दिया गया था कि वह सुनाई गई सजा के खिलाफ अपील दायर कर सकता है, को देखते हुए जघन्य अपराधों के पीड़ितों को यह अधिकार है कि वह जमानत को रद्द किये जाने के लिए कोर्ट की शरण ले।”

कोर्ट ने पीड़िता द्वारा दायर अपील को जायज ठहराया और कहा, “एक बार जब अपील का अधिकार दे दिया गया है, तो इसमें सभी संबंधित अधिकार शामिल होंगे जो कि अपील के अधिकार से जुड़ा हुआ है… अगर पीड़िता को इस तरह के आदेश से तकलीफ पहुँची है तो उसे जमानत को रद्द किये जाने की अपील का अधिकार है…उपरोक्त प्रावधान को देखते हुए हम पाते हैं कि पीड़िता को यह अधिकार है कि वह सजा को निलंबित करने के आदेश के खिलाफ अपील करे क्योंकि यह उसका अधिकार और उसकी गरिमा का मामला है…”

 

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