शोपियां फायरिंग: जम्मू- कश्मीर सरकार ने केंद्र का किया विरोध, कहा संविधान पीठ के फैसले के मुताबिक हुई कार्रवाई

LiveLaw News Network

16 July 2018 2:15 PM GMT

  • शोपियां फायरिंग: जम्मू- कश्मीर सरकार ने केंद्र का किया विरोध, कहा संविधान पीठ के फैसले के मुताबिक हुई कार्रवाई

    केंद्र के लिए एक बड़ी शर्मिंदगी में राज्यपाल शासन के अधीन जम्मू-कश्मीर सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में केंद्र सरकार के दावे पर विवाद किया है कि राज्य के पास सेनाकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने की शक्ति नहीं है।

    जम्मू-कश्मीर सरकार के लिए उपस्थित वरिष्ठ वकील शेकर नाफड़े ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़ की पीठ के सामने तर्क दिया कि कोर्ट को FIR की जांच पर लगी रोक को हटा लेना चाहिए क्योंकि ये रोक अनिश्चितकालीन नहीं हो सकती। एफआईआर के खिलाफ याचिका दायर करने के लिए सेना अधिकारी के पिता के पास कोई अधिकार नहीं है।

    पहले की संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि एक बार पुलिस को शिकायत मिलेगी तो वो FIR दर्ज करेगी। नाफड़े चाहते थे वह एफआईआर के पंजीकरण के मुद्दे पर  सभी राज्यों को नोटिस जारी किया जाए।

    उन्होंने कहा कि चूंकि कानून व्यवस्था एक राज्य विषय है इसलिए भारत संघ की याचिका को स्वीकार करने से देश भर के सभी राज्यों में पुलिस की वैधानिक शक्तियां प्रभावित होंगी। अटॉर्नी जनरल केके  वेणुगोपाल ने पिछले हफ्ते दायर जम्मू-कश्मीर सरकार के हलफनामे का विरोध किया और कहा कि AFSPA की धारा 7 के अनुसार सेना के कर्मियों को अभियोजन पक्ष से संरक्षित किया गया है। उन्होंने कहा कि केंद्र से पूर्व मंजूरी एफआईआर के पंजीकरण से पहले आवश्यक है क्योंकि सेना अधिकारी अभियोजन पक्ष से सरंक्षित हैं।

    हालांकि पीठ ने कहा कि वो 30 जुलाई को कानूनी मुद्दों को तय करेगी। इसमें मेजर के पिता द्वारा दाखिल याचिका सुनवाई योग्य है या नहीं, ये भी शामिल है।

    गौरतलब है कि 24 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने सेना के अफसरों पर राज्य सरकार द्वारा दर्ज FIR को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई 16 जुलाई तक टाल दी थी और कहा था कि  FIR पर जांच पर रोक बरकरार रहेगी।

    सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगवाई वाली पीठ ने ये सुनवाई जम्मू कश्मीर सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील शेखर नाफड़े के आग्रह पर टाली थी जब उन्होंने केंद्र सरकार के हलफनामे पर जवाब देने के लिए वक्त देने की मांग की थी।

    इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने पांच मार्च को बडा कदम उठाते हुए सेना पर दर्ज FIR पर आगे जांच करने पर रोक लगा दी थी।

    इसके बाद केंद्र सरकार ने सेना के मेजर आदित्य के समर्थन में दाखिल की अर्जी दाखिल की थी।

    केंद्र सरकार ने कहा कि जम्मू कश्मीर सरकार के पास ये अधिकार नही है कि वो बिना केंद्र सरकार की अनुमति के सेना के अफसर खिलाफ FIR दर्ज कर सके। केंद्र सरकार ने कहा है कि इस विषय पर गहन विचार किया गया और ये पाया कि केंद्र सरकार की इजाजत के बिना राज्य सरकार इस मामले में कोई भी आपराधिक करवाई सेना के अफसर के खिलाफ नही कर सकती। राज्य सरकार ने केंद्र सरकार को कोई इजाजत नही ली है। केंद्र सरकार ने कहा कि जम्मू कश्मीर में आतंकवादी और देश विरोधी ताकतें कानून का उलंधन कर रही है इससे सुरक्षा व्यस्था प्रभावित होती है।ऐसे लोगों के पास आधुनिक हथियार भी है और उन्हें सीमा पार के देशों का समर्थन भी है। जो पुलिस और सुरक्षा बल उनका विरोध करते है उनपर हमले हो रहे है।राष्ट्रहित में देश  की सुरक्षा और एकता को बनाने रखने के लिए सेना को सुरक्षा देने वाले AFPSA की धारा 7 की व्याख्या करनी जरूरी है। इसकी जांच आगे नही होनी चाहिए और FIR पर रोक लगनी चाहिए।

    वहीं सुनवाई के दौरान AG के के वेणुगोपाल ने भी सेना का समर्थन करते हुए कहा कि AFSPA लगी होने की वजह से राज्य सरकार सेना के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकती।

    वहीं जम्मू कश्मीर सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील शेखर नाफड़े ने कहा था कि FIR में मेजर आदित्य को आरोपी नहीं बनाया गया है। सिर्फ ये लिखा गया है कि वो बटालियन की अगवाई कर रहे थे।

    चीफ जस्टिस ने पूछा था कि क्या वो नामजद हो सकते हैं ? इस पर नाफड़े ने कहा कि ये जांच होने पर ही पता चलेगा। उन्होंने मांग की कि इस राज्य सरकार को मामले की जांच आगे बढाने की इजाजत मिलनी चाहिए। साथ ही उनकी दलील थी कि राज्य सरकार बिना केंद्र की इजाजत FIR दर्ज कर सकती है।

    लेकिन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि ये मामला सेना के अफसरों से जुडा है किसी आम अपराधी से नहीं। इसलिए फिलहाल जांच नहीं होगी।

    गौरतलब है कि 12 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर सरकार और केंद्र सरकार को उस याचिका पर नोटिस जारी कर जवाब मांगा था जिसमें शोपियां में दो नागरिकों की हत्या के संबंध में मेजर आदित्य कुमार के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग की गई थी।

    दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश देते हुए  मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने निर्देश दिया था कि तब तक मेजर कुमार के खिलाफ "कोई दंडनीय कार्रवाई नहीं की जाएगी।”  मेजर के खिलाफ सभी कार्रवाई की रोक दी गई थीं।

    सेना के कर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने को लेकर सैनिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए दो याचिकाओं में उठाए गए मुद्दों और जांच की मांग पर बेंच ने अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल की सहायता मांगी थी।

    गौरतलब है कि शोपियां के गांवपोरा गाँव में पत्थरबाजी कर रही भीड़ पर सेना कर्मियों ने गोलीबारी कर दो नागरिकों की कथित हत्या कर दी थी, जिसके बाद मुख्यमंत्री ने घटना की जांच का आदेश दिया। सेना की 10 गढ़वाल इकाई के मेजर कुमार सहित अन्य कर्मियों के खिलाफ रणबीर दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और 307 (हत्या की कोशिश) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।

    आदित्य कुमार के पिता लेफ्टिनेंट कर्नल करमवीर सिंह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और वकील ऐश्वर्या भाटी ने सैनिकों के अधिकारों की सुरक्षा और उनके लिए पर्याप्त मुआवजे का भुगतान करने के लिए दिशा-निर्देश और प्राथमिकी रद्द करने की मांग की ताकि सेना के कर्मियों को अपने कर्तव्यों का प्रयोग करने के दौरान आपराधिक कार्यवाही शुरू करने से परेशान ना किया जा सके।

    "यह एक बहुत गंभीर मुद्दा है। सेना ने कभी ऐसी खतरनाक स्थिति का सामना नहीं किया", रोहतगी ने पीठ को बताया था।

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